जब उस्मानी तुर्कों (Ottoman Turks) के पास कोई मेहमान आता, तो वे उसके सामने क़हवा और सादा पानी पेश करते। अगर मेहमान पानी की तरफ हाथ बढ़ाता, तो वे समझ जाते कि मेहमान को भूख लगी है, फिर वे बेहतरीन खाने का इंतज़ाम करते। और अगर वह क़हवा की तरफ हाथ बढ़ाता, तो वे जान लेते कि मेहमान को खाने की ज़रूरत नहीं है।
अगर किसी घर के बाहर पीले रंग के फूल रखे नज़र आते, तो इसका मतलब होता था कि इस घर में कोई मरीज़ (बीमार) मौजूद है; आप उस मरीज़ की वजह से घर के बाहर शोर-शराबा न करें और उसकी अयादत (हाल-चाल पूछने) के लिए आ सकते हैं। और अगर घर के बाहर सुर्ख (लाल) फूल रखे होते, तो यह इशारा होता कि घर में बालिग लड़की है, इसलिए घर के आस-पास बाज़ारी जुमले (अश्लील शब्द) न बोले जाएं, और अगर आप निकाह का पैग़ाम लाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है।
घर के बाहर दो किस्म के डोर-बेल (घंटीनुमा) हथौड़े रखे होते थे: एक बड़ा और एक छोटा। अगर बड़ा हथौड़ा बजाया जाता, तो इशारा होता कि घर के बाहर कोई मर्द आया है, इसलिए घर का मर्द बाहर जाता था। और अगर छोटा हथौड़ा बजता, तो मालूम होता कि बाहर कोई महिला मौजूद है, इसलिए उसके इस्तक़बाल (स्वागत) के लिए घर की महिला दरवाज़ा खोलती थी।
उस्मानी तुर्कों के सदक़ा (दान) देने का अंदाज़ भी कमाल का था: उनके मालदार (अमीर) लोग सब्ज़ी बेचने वालों या दुकानदारों के पास जाकर अपने नाम से खाता खुलवा लेते थे। और जो भी ज़रूरतमंद सब्ज़ी या राशन लेने आता, तो दुकानदार उससे पैसे लिए बिना अनाज और सब्ज़ी दे देता था, यह बताए बिना कि इसका पैसा कौन देगा। कुछ समय बाद वह मालदार व्यक्ति पैसे अदा करके खाता साफ़ करवा देता था।
अगर किसी उस्मानी तुर्क की उम्र तिरसठ (63) साल से बढ़ जाती और उससे कोई पूछता कि "आपकी उम्र क्या है?", तो वह नबी पाक (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से हया और अदब करते हुए यह नहीं कहता था कि "मेरी उम्र तिरसठ साल से ज़्यादा हो गई है।" बल्कि यह कहता: "बेटा, हम हद से आगे बढ़ चुके हैं।"
कैसा अदब, कैसा इश्क़ था उन लोगों का! कैसी बेहतरीन आदतें थीं उन लोगों की! यही वजह थी कि आलम-ए-कुफ़्र (ग़ैर-मुस्लिम जगत) ने सल्तनत-ए-उस्मानिया के ग़द्दारों से मिलकर इसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले।
मेरा दिल करता है कि इस पोस्ट को मैं हर मुसलमान तक पहुँचाऊँ ताकि तमाम मुसलमान अपने इतिहास को पढ़ें और फिर से इन उसूलों को अपनाएं, इंशाअल्लाह। अल्लाह पाक हम सबको सिराते मुस्तक़ीम (सीधे रास्ते) पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।