प्यारी खाला (मौसी)!

12 जून 2025 का दिन मेरे लिए हमेशा याद...
Ummah Post
21 August, 2025

प्यारी खाला (मौसी)!

12 जून 2025 का दिन मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा — मगर अफ़सोसनाक और दर्दनाक याद के तौर पर। दोपहर का वक्त था, मौसम शदीद (बहुत) गर्म था। अचानक सोशल मीडिया पर बिजली बनकर एक खबर वायरल हुई कि अहमदाबाद से लंदन जाने वाला विमान, उड़ान भरने के कुछ ही लम्हों बाद एक हॉस्टल पर जा गिरा जहाँ मेडिकल के छात्र रहते थे। इस उड़ान में कुल 242 लोग सवार थे, जिनमें से सिर्फ एक की जान बची, बाकी सब जान की बाज़ी हार गए। और हॉस्टल में मौजूद कई लोग भी इस हादसे की नज़र (भेंट) हो गए।

इस हादसे की विभिन्न वीडियो देखकर पहले ही दिल सदमे में था कि यह दर्दनाक खबर भी मिल गई कि इस क्रैश हुए विमान में मेरी खाला भी मौजूद थीं, जो अपनी बेटी से मिलने लंदन जा रही थीं। यह खबर सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए, तरह-तरह के विचार आने लगे। दिल ही दिल में दुआ की कि अल्लाह मेरी खाला को बचा ले, लेकिन अल्लाह का फ़ैसला नाफ़िज़ (लागू) हो चुका था। खाला दारे-फ़ानी (नश्वर संसार) को छोड़कर दारे-बक़ा (परलोक) की तरफ रवाना हो चुकी थीं, शहादत पा चुकी थीं, दुनिया की परेशानियों से निजात पाकर आख़िरत (परलोक) की राहत पाने के लिए मुंतक़िल (स्थानांतरित) हो चुकी थीं... "इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन" (बेशक हम अल्लाह ही के हैं और हमें उसी की तरफ लौट कर जाना है)।

खाला मेरी वालिदा (अम्मी) से उम्र में छोटी थीं, वालिदा का उनसे गहरा लगाव था, दोनों एक-दूसरे से बेहद मोहब्बत करती थीं। लंदन जाने से पहले खाला ने वालिदा से खाने की एक चीज़ की फ़रमाइश भी की थी, जो आमतौर पर बारिश के मौसम में बनाई जाती है। वालिदा ने ख़ुशी-ख़ुशी वह चीज़ तैयार करके भेज दी थी। चूंकि उनका लंदन जाना तय हो चुका था, इसलिए उन्होंने कह दिया था कि वह चीज़ फ्रिज में रखवा देना, मैं वापस आकर खा लूंगी। मगर किसे पता था कि वह वापसी का दिन कभी आने वाला नहीं है और उनकी यह पसंदीदा चीज़ खाने की ख़्वाहिश अधूरी रह जाने वाली है। जुमेरात (गुरुवार) को जब वह लंदन जाने के लिए रवाना हुईं, उसी दिन उनकी वह पसंदीदा चीज़ वालिदा ने उनके घर पहुँचाने के लिए रवाना कर दी। एक तरफ उनकी वह पसंदीदा चीज़ घर पहुँचने वाली थी और दूसरी तरफ वह मौत की सवारी पर सवार होने जा रही थीं। वालिदा ने रोते हुए बताया कि वह लंदन जाने के लिए काफी खुश थीं। ज़ाहिर सी बात है, अपनी बेटी से मिलने की ख़ुशी किसे नहीं होगी! यक़ीनन काफी तमन्नाएँ और उम्मीदें लेकर जा रही होंगी, लेकिन यही इस दुनिया की हक़ीक़त है कि यहाँ सारी ख़्वाहिशें पूरी नहीं होतीं, यह दुनिया अचानक धोखा दे जाती है।

इस किस्म के हादसे दुनिया वालों के लिए बड़ी इबरत (सबक) छोड़ जाते हैं। इसमें सबसे बड़ी इबरत यह है कि इस ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं, इसका ख़ात्मा कब और कहाँ हो जाए कोई नहीं जानता। क़ुरआन में अल्लाह ने यह बात विभिन्न अंदाज़ में समझाई है। एक जगह अल्लाह ने फ़रमाया: "तुम जहाँ कहीं भी रहो, मौत तो तुम्हें आ पकड़ेगी, चाहे तुम मज़बूत क़िलों में ही क्यों न हो!" [अन-निसा: 78]। इसी तरह फ़रमाने-ख़ुदा है: "और कोई जान नहीं जानती कि किस ज़मीन पर उसकी मौत वाक़े (घटित) होगी। यक़ीनन अल्लाह ही खूब जानने वाले और खूब बाख़बर हैं।" [लुक़मान: 34]। किसी व्यक्ति को इस बात का ज्ञान नहीं है कि किस धरती पर उसकी मौत होगी।

अल्लाह ने यह भी फ़रमाया है कि: "बेशक अल्लाह का मुक़र्रर (तय) किया हुआ वक्त जब आ जाता है, तो टाला नहीं जाता, काश कि तुम समझ जाते!" [नूह: 4]। यानी जब किसी इंसान की मौत का वक्त आता है तो वह टलता नहीं, न एक घड़ी आगे होता है और न एक घड़ी पीछे...

ऐसे हादसों के बाद भी इंसान अपनी ज़िंदगी को तब्दील (बदल) न करे, आपस की नफ़रतों को न भुलाए, बल्कि वही आपसी दुश्मनी वाली ज़िंदगी गुज़ारता रहे, तो इससे बड़ा महरूम (अभागा) कोई नहीं हो सकता। इंसान दुनिया के हक़ीर (तुच्छ) सामान की वजह से अपनों से रिश्ता तोड़ लेता है। सालहा-साल (कई वर्ष) गुज़र जाते हैं, भाई-भाई में बात नहीं होती, भाई-बहनों में बात नहीं होती, एक सीने से दूध पीने वाले एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। लेकिन जब ऐसे हादसे होते हैं, तो इंसान अफ़सोस करने लगता है, अपनी पिछली ज़िंदगी पर शर्माने लगता है और सोचने लगता है कि काश मैंने जाने वाले से अच्छा ताल्लुक़ (संबंध) बना लिया होता, लेकिन उस वक्त अफ़सोस करने से कोई फ़ायदा नहीं होता... इससे पहले कि हममें से किसी पर ऐसा हाल आए, अभी से अपने दिलों को साफ़ कर लीजिए! अपनों को माफ़ कर दीजिए! अगर आपने वालिदैन (माता-पिता) को नाराज़ किया है, तो माफ़ी मांग लीजिए! अगर आपके भाई या बहन से या किसी और रिश्तेदार से आपका ताल्लुक़ टूट चुका है, तो उसे जोड़ लीजिए। अगर इसके लिए झुकना पड़े तो झुक जाइए, अल्लाह की क़सम! आपका यह झुकना आपको ऊँचा कर देगा... प्यारे आक़ा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फ़रमान है: "जो अल्लाह के लिए झुकता है, अल्लाह उसे ऊँचा कर देता है।"

तक़रीबन चार दिन के इंतज़ार के बाद पीर (सोमवार) की रात ढाई बजे खाला जान ताबूत में सवार होकर हमारे सामने आईं। जब यह ताबूत पहुँचा तो हर आँख अश्कबार (नम) थी। हमेशा मुस्कुराने और हँसने वाली खाला आज ख़ामोश थीं और सबको रुला रही थीं... 😢 खाला हमें छोड़ गईं, मगर एक ज़बरदस्त पैग़ाम (संदेश) दे गईं: "ज़िंदगी फ़ानी (नश्वर) है, यह अचानक ख़त्म हो जाती है, इसलिए दिलों को साफ़ रखो, रिश्तों को निभाओ, और हर वक्त मौत के लिए तैयार रहो!" अल्लाह तआला खाला की मग़फ़िरत (क्षमा) फ़रमाए, उनको शुहदा (शहीदों) में शुमार फ़रमाए, हमें और ख़ास तौर पर उनके शौहर (पति) और बेटे-बेटियों को सब्रे-जमील (उत्कृष्ट धैर्य) नसीब फ़रमाए, हमें उनके लिए ईसाले-सवाब (पुण्य पहुँचाना) करते रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

आमीन।

- मुबशिर कावी

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