"हर नज़र में बेगुनाह रहना मुमकिन नहीं होता...
चलो कोशिश करत...
Ummah Post
21 August, 2025

"हर नज़र में बेगुनाह रहना मुमकिन नहीं होता...

चलो कोशिश करते हैं कि कम से कम अपनी नज़र में बेदाग़ रहें...✨"

Share this article
युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ
लेख

युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ

कितने पुरुष हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अल-माएदा" की तफ़सीर पढ़ाई गई और कितनी महिलाएँ हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अन-नूर" की तफ़सीर पढ़ाई गई? जानता हूँ, बहुत कम हैं। मगर दूसरी तरफ देखें...! कितने पुरुष हैं जिन्होंने माता-पिता से बालिग होने के बाद सुना कि "तुम्हारी कोई ऐसी-वैसी बात न स...