एतदाल (संतुलन/मध्यम मार्ग) की हसीन शाहराह, इल्म व इरफ़ान (ज्ञान और अध्यात्म) का केंद्र, ख़ैर व बरकत का स्रोत, अहल-ए-हक़ (सत्य के अनुयायियों) की शरणस्थली, तर्जुमान-ए-अहल-ए-सुन्नत वल-जमात, उम्मुल मदारिस (मदरसों की माँ), अज़हर-ए-हिन्द—दारुल उलूम देवबंद।
इसे एक संस्था कहिए या कहिए फिरंग (ब्रिटिश) दौर में चलाई जाने वाली एक इंक़लाबी (क्रांतिकारी) तहरीक; मौजूदा दौर में पनपने वाले फ़ितनों का तोड़ कहिए या कहिए इस आधुनिक दौर में असल इस्लाम के अस्तित्व की रक्षा की गारंटी; हिस्न-ए-तहफ़्फ़ुज़-ए-ख़त्म-ए-नबुव्वत (अंतिम पैगंबरत्व की रक्षा का क़िला) कहिए या कहिए दिफ़ा-ए-इस्लाम (इस्लाम की रक्षा) के लिए खड़ी की जाने वाली एक लोहे की दीवार।
संक्षेप में, यह संस्था कुदरत-ए-ख़ुदावंदी (ईश्वरीय शक्ति) का एक महान शाहकार, हिकमत-ए-ख़ुदावंदी (ईश्वरीय ज्ञान) का प्रतीक, इस्लामी दुनिया—विशेष रूप से उपमहाद्वीप (बर-ए-सग़ीर) के धार्मिक लोगों पर एक महान उपकार, इस्लाम के पुनरुत्थान का एक माध्यम, और हक़ को साबित करने व बातिल (असत्य) को मिटाने की एक व्याख्या है।
इख़्लास व तक़्वा (निष्ठा और परहेज़गारी) की बुनियाद पर स्थापित होने वाली यह बरकत वाली संस्था जहाँ इस्लाम के अस्तित्व की ज़ामिन (गारंटी) ठहरी, वहीं मर्दुम-साज़ी (महान हस्तियों को गढ़ने) का ऐसा बेमिसाल कैंप साबित हुई जहाँ से सैकड़ों मुअद्दिसीन (हदीस के ज्ञाता) व मुफ़स्सिरीन (क़ुरआन के व्याख्याकार), हज़ारों फ़ुक़हा (इस्लामी न्यायविद) व मुतकल्लिमीन (धर्मशास्त्री) और अनगिनत ख़तीब व वाइज़ीन (वक्ता और उपदेशक) निकले। उन्होंने हर मैदान, हर क्षेत्र और दुनिया के हर कोने में न केवल कामयाबी व कामरानी के झंडे गाड़े, बल्कि ऐसे-ऐसे नुमायाँ (उत्कृष्ट) कारनामे अंजाम दिए जिन पर दुनिया की अक़्ल हैरान रह गई और दुनिया वाले उनकी तरबियत (परवरिश) की दाद देते रह गए।
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ उसी दारुल उलूम देवबंद और इसके फ़ैज़-याफ़्ता (इससे लाभान्वित) उलेमा-ए-देवबंद की।
शायर कहता है:
"तारीख़ मुरत्तब करती है दीवानों की रूदाद यहाँ।"
(इतिहास यहाँ के दीवानों का क़िस्सा तैयार करता है)
और अल्हम्दुलिल्लाह, मर्दुम-साज़ी (महान इंसान बनाने) का यह मुबारक सिलसिला अब तक जारी है और इंशा-अल्लाह क़यामत तक जारी रहेगा।
✍🏻 #मुस्तक़ीम_जमाली