बच्चों को ज़्यादा सज़ा देना उपयोगी (फायदेमंद) नहीं
हकीम-उल-उम्मत हज़रत मौलाना मोहम्मद अशरफ अली थानवी (रह.)
आपने फ़रमाया कि शिक्षा (और प्रशिक्षण) के लिए ज़्यादा सज़ा देना उपयोगी नहीं है। इसके निम्नलिखित नुकसान (मफासिद) हैं:
1. सज़ा के डर से बच्चे अपना याद किया हुआ भूल जाते हैं।
2. बच्चों के क़ुवा (शारीरिक और मानसिक शक्तियां) कमज़ोर हो जाते हैं।
3. ज़्यादा पिटते-पिटते बच्चे सज़ा के आदी बन कर ढीठ (बेहया) हो जाते हैं। फिर सज़ा का उन पर कोई असर नहीं होता।
4. चूंकि बच्चों में बदला (इंतकाम) लेने की ताक़त नहीं होती, इसलिए उनके दिल में कीना (द्वेष/बैर) पैदा हो जाता है। फिर कीना से हसद (ईर्ष्या) पैदा होती है।
5. फिर वे दूसरों को तकलीफ़ पहुँचाने (ईज़ा-रसानी) की फ़िक्र में लग जाते हैं।
6. इसके बाद उन्हें मक्र व फ़रेब (छल-कपट) की आदत पड़ जाती है। ये सब (बुराइयाँ) किब्र (अहंकार) की औलाद हैं।
(माआरिफ़-ए-अशरफ़िया, पृष्ठ 106)