"वह पैग़म्बर-ए-अदल (न्याय के दूत), मीज़ान (तराज़ू/इंसाफ) वाल...
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"वह पैग़म्बर-ए-अदल (न्याय के दूत), मीज़ान (तराज़ू/इंसाफ) वाले,

अदालत (न्याय) का पैकर (प्रतीक), वह बुर्हान (ठोस प्रमाण) वाले।"

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युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ
लेख

युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ

कितने पुरुष हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अल-माएदा" की तफ़सीर पढ़ाई गई और कितनी महिलाएँ हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अन-नूर" की तफ़सीर पढ़ाई गई? जानता हूँ, बहुत कम हैं। मगर दूसरी तरफ देखें...! कितने पुरुष हैं जिन्होंने माता-पिता से बालिग होने के बाद सुना कि "तुम्हारी कोई ऐसी-वैसी बात न स...