शेख चिल्ली का नाम सबने सुना होगा।😅
एक दिन उसके पड़ोसियों न...
Ummah Post
By Hassan
18 October, 2025

शेख चिल्ली का नाम सबने सुना होगा।😅

एक दिन उसके पड़ोसियों ने एक प्याले में सालन (सब्जी) डालकर उनके घर भेजा। यह सालन शेख चिल्ली ने पहले कभी नहीं देखा था। उसने माँ से पूछा, "यह क्या है?"

माँ ने जवाब दिया, "इसे बड़ियाँ कहते हैं।"

शेख चिल्ली ने गोल-गोल तैरते टुकड़ों में से एक को उठाया और फिर पूछा, "यह क्या है?"

माँ ने संक्षिप्त जवाब दिया, "बड़ी।"

शेख चिल्ली ने खूब पेट भरकर खाया। उसे यह खाना बहुत पसंद आया। "यह तो बहुत मजेदार है!"

अगले हफ्ते शेख चिल्ली माँ से जिद करने लगा, "माँ, मैं तो वही खाना खाऊँगा जो पड़ोसियों के घर से आया था।"

माँ ने कहा, "इसमें बहुत मेहनत और समय लगता है। न तो मेरे अंदर दाल पीसने की हिम्मत है और न ही ताकत। अगर तुम इतने ही उतावले (बेचैन) हो रहे हो, तो बहू को लाने के बहाने अपने ससुराल चले जाओ। वही तुम्हारे नखरे उठाएँगे। उनसे फरमाइश कर लेना।"

शेख चिल्ली खुश हो गया और माँ से पूछा, "उस सालन का क्या नाम था?"

माँ ने कहा, "बड़ियाँ कह देना या बड़ी कह देना, वे समझ जाएँगे।"

शेख चिल्ली जाने की तैयारी करने लगा। जब तैयार हुआ तो फिर सालन का नाम भूल गया और अपनी माँ से पूछा, "माँ, मैं उसका नाम भूल गया, फिर से बताना।"

माँ ने फिर बताया, "बड़ियाँ।"

शेख चिल्ली ने कहा, "अगर मैं वहाँ जाकर भूल गया तो कौन याद दिलाएगा?"

माँ ने कहा, "तुम ऐसा करो कि सारे रास्ते बड़ियाँ-बड़ियाँ कहते चले जाना।"

शेख चिल्ली रवाना हुआ। वह कहता जा रहा था, "बड़ियाँ। बड़ियाँ। बड़ियाँ।"

रास्ते में चिड़ीमारों (पक्षियों को पकड़ने वालों) ने जाल लगाया था। जब उन्होंने सुना 'बड़ियाँ' (उर्दू/पंजाबी में बड़ना यानी दाखिल होना या घुस जाना, इसलिए बड़ियाँ का मतलब हुआ कि वे घुस गईं), तो वे समझे कि चिड़ियाँ जाल में आ गई हैं। उन्होंने जाल खींचा मगर वह तो खाली था। उन्होंने शेख चिल्ली को खूब पीटा।

शेख चिल्ली ने पूछा, "मुझे क्यों मारते हो?"

वे कहने लगे, "तुम जो कह रहे थे बड़ियाँ-बड़ियाँ।"

शेख चिल्ली ने पूछा, "तो फिर क्या कहूँ?"

उन्होंने कहा, "तुम कहो: आते जाओ, फँसते जाओ। आते जाओ, फँसते जाओ।"

अब शेख चिल्ली कहता हुआ रवाना हुआ, "आते जाओ, फँसते जाओ। आते जाओ, फँसते जाओ।"

आगे जंगल में कुछ चोर अपनी चोरी का माल दबा (छुपा) रहे थे। उन्होंने जब सुना "आते जाओ, फँसते जाओ", तो वे डर गए कि कोई संतरी (चौकीदार) है जिसने उन्हें देख लिया है। वे डरकर एक पेड़ के पीछे छुप गए। मगर जब देखा कि एक मदमस्त सा शख्स अपनी ही धुन में बोले जा रहा है, तो उन्होंने उसे पकड़ लिया और खूब पीटा।

शेख चिल्ली ने पूछा, "मुझे क्यों मारते हो?"

उन्होंने कहा, "तुम जो कहते हो आते जाओ, फँसते जाओ।"

शेख चिल्ली ने पूछा, "फिर क्या कहूँ?"

उन्होंने कहा, "तुम कहो: लाते जाओ, दबाते जाओ।"

अब शेख चिल्ली कहता हुआ रवाना हुआ, "लाते जाओ, दबाते जाओ। लाते जाओ, दबाते जाओ।"

आगे एक जनाज़ा (शवयात्रा) आ रहा था। जब उन्होंने सुना कि 'लाते जाओ, दबाते जाओ', तो उन्होंने शेख चिल्ली को पकड़ लिया और खूब पीटा। "हमारा जवान बच्चा मर गया और तुम कह रहे हो कि लाते जाओ, दबाते जाओ!"

शेख चिल्ली ने रोते हुए पूछा, "फिर मैं क्या कहूँ?"

"तुम कहो: ऐसा अल्लाह किसी के साथ न करे," शेख चिल्ली को जवाब मिला।

शेख चिल्ली कहता हुआ रवाना हुआ, "ऐसा अल्लाह किसी के साथ न करे। ऐसा अल्लाह किसी के साथ न करे।"

शेख चिल्ली को रास्ते में एक बारात मिली। उन्होंने जब शेख चिल्ली की यह रट सुनी, तो उसे बहुत पीटा।

शेख चिल्ली ने पूछा, "मुझे क्यों मारते हो?"

उन्होंने जवाब दिया, "हमारा खुशी का मौका है और तुम कह रहे हो कि ऐसा अल्लाह किसी के साथ न करे!"

शेख चिल्ली ने पूछा, "फिर क्या कहूँ?"

उन्होंने कहा, "कहना क्या है, चुपचाप चले जाओ।"

शेख चिल्ली रवाना हुआ। थोड़ी देर बाद वह अपने ससुराल पहुँच गया। वहाँ उसका बहुत ज़ोरदार स्वागत हुआ। उसके आगे तरह-तरह के खाने रखे गए। मगर शेख चिल्ली ने किसी खाने को हाथ नहीं लगाया। ससुराल वाले परेशान हो गए।

उन्होंने पूछा, "क्या खाना पसंद नहीं आया? आप बताइए क्या खाएँगे?"

शेख चिल्ली खाने का नाम भूल चुका था, बोला, "हम तो वही खाना खाएँगे।"

उन्होंने पूछा, "कौन सा खाना?"

शेख चिल्ली बोला, "हम तो वही खाना खाएँगे।"

अब उन्होंने विभिन्न खानों के नाम लेने शुरू कर दिए। मगर शेख चिल्ली का हर बार वही जवाब होता, "हम तो वही खाना खाएँगे।"

ससराल वाले तंग आ गए और उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। रात को शेख चिल्ली को भूख लगी तो सब सो चुके थे। वह चुपके-चुपके रसोई (बावरची खाने) में गया और चीजें टटोलने लगा। उसके हाथ में एक अंडा आया। अभी वह इसके बारे में सोच ही रहा था कि एक डिब्बा धड़ाम से नीचे गिरा। घर वाले समझे कि बिल्ली आई है, वे रसोई की तरफ दौड़े। शेख चिल्ली को अंडा छुपाने की कोई जगह नहीं मिली, तो उसने झट से अंडा मुँह में रख लिया।

सास ने आकर देखा तो दामाद के मुँह में फोड़ा निकला हुआ था। "हाय-हाय! इसके मुँह में फोड़ा निकला है, इसीलिए रात को भी खाना नहीं खाया।"

आधी रात को हकीम साहब को जगाकर घर बुलाया गया। हकीम साहब ने आकर मुआयना (जाँच) किया। जब उन्होंने शेख चिल्ली का गाल एक तरफ से दबाया, तो उसने अंडा दूसरी तरफ कर लिया। अब हकीम साहब जिस तरफ से गाल दबाते, शेख चिल्ली अंडा दूसरी तरफ कर लेता। काफी देर यह सिलसिला जारी रहा।

आखिर हकीम साहब थककर बोले, "यह तो बड़ी (Badi) खतरनाक बीमारी है।"

जैसे ही शेख चिल्ली ने 'बड़ी' शब्द सुना, उसे याद आ गया। मुँह से अंडा निकालकर चिल्लाने लगा, "हम तो बड़ी खाना खाएँगे! हम तो बड़ी खाना खाएँगे!"

शेख चिल्ली की मुश्किल आसान हुई और उसके ससुराल वालों की भी।

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