"जो वक्त के फिरौन और अबू जहल से न टकराए।"
कुफ़्र (अधर्म) को...
Ummah Post
By Mohd
6 November, 2020

"जो वक्त के फिरौन और अबू जहल से न टकराए।"

कुफ़्र (अधर्म) को इस बात की चिंता नहीं है कि आप मस्जिदों में बैठकर अल्लाह-अल्लाह करें, नमाज़ें पढ़ें या लंबे-लंबे अज़कार (प्रार्थना) करें, मिंबरों पर फ़ज़ाइल (महिमा) सुनाएं या क़ुरान व हदीस के सबक़ में मसरूफ़ हो जाएं, रंग-बिरंगी पगड़ियाँ पहनें, या मातम और मिलाद के जुलूस निकालें, जुमेरातें (गुरुवार) और शब-ए-बारात मनाएं या हम्द व नात की महफ़िलें सजाएं। कुफ़्र चाहता है कि आप यह सब शौक से करें, मगर कुफ़्र और इल्हाद (नास्तिकता) के निज़ाम (व्यवस्था) के मातहत (अधीन) रहकर करें और अल्लाह के निज़ाम को लागू करने की बात न करें। आप खानक़ाहें बनाएं, उर्स मनाएं, इज्तिमा (सभाएं) करें, मगर अल्लाह के निज़ाम की सर्वोच्चता की बात न करें; हुकूमत का अख्तियार कुफ़्र को सौंप दें और इस्लाम को महकूम (अधीन) रहने दें। कुफ़्र के ऐवानों (महलों) में ज़लज़ला तो तब आता है, जब मुसलमान सामूहिक व्यवस्था (इज्तिमाई निज़ाम) को क़ायम करने की सुन्नत पर अमल करता है। ऐसा कोई इस्लाम रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम) से साबित नहीं है, जो वक्त के फिरौन और अबू जहल से न टकराए।

- आमिर अवाम.....

Share this article
अल्लाह का ख़ौफ़ और मग़्फ़िरत: सहीह मुस्लिम की एक ईमान अफ़रोज़ हदीस
लेख

अल्लाह का ख़ौफ़ और मग़्फ़िरत: सहीह मुस्लिम की एक ईमान अफ़रोज़ हदीस

एक हदीस हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मर्वी (वर्णित) है... फ़रमाते हैं कि एक मर्तबा हुज़ूर अक़्दस (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पिछली उम्मतों के एक शख़्स का वाक़िया बयान फ़रमाया... कि एक शख़्स था जिसने अपनी जान पर बड़ा ज़ुल्म किया था... बड़े-बड़े गुनाह किए थे... बड़ी ख़राब ज़िंदगी गुज़ारी थी....