"जो वक्त के फिरौन और अबू जहल से न टकराए।"
कुफ़्र (अधर्म) को इस बात की चिंता नहीं है कि आप मस्जिदों में बैठकर अल्लाह-अल्लाह करें, नमाज़ें पढ़ें या लंबे-लंबे अज़कार (प्रार्थना) करें, मिंबरों पर फ़ज़ाइल (महिमा) सुनाएं या क़ुरान व हदीस के सबक़ में मसरूफ़ हो जाएं, रंग-बिरंगी पगड़ियाँ पहनें, या मातम और मिलाद के जुलूस निकालें, जुमेरातें (गुरुवार) और शब-ए-बारात मनाएं या हम्द व नात की महफ़िलें सजाएं। कुफ़्र चाहता है कि आप यह सब शौक से करें, मगर कुफ़्र और इल्हाद (नास्तिकता) के निज़ाम (व्यवस्था) के मातहत (अधीन) रहकर करें और अल्लाह के निज़ाम को लागू करने की बात न करें। आप खानक़ाहें बनाएं, उर्स मनाएं, इज्तिमा (सभाएं) करें, मगर अल्लाह के निज़ाम की सर्वोच्चता की बात न करें; हुकूमत का अख्तियार कुफ़्र को सौंप दें और इस्लाम को महकूम (अधीन) रहने दें। कुफ़्र के ऐवानों (महलों) में ज़लज़ला तो तब आता है, जब मुसलमान सामूहिक व्यवस्था (इज्तिमाई निज़ाम) को क़ायम करने की सुन्नत पर अमल करता है। ऐसा कोई इस्लाम रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम) से साबित नहीं है, जो वक्त के फिरौन और अबू जहल से न टकराए।
- आमिर अवाम.....