पिछले दिनों हमारी एक कोलीग (सहकर्मी) की तरक़्क़ी (प्रमोशन) ह...
Ummah Post
4 November, 2026

पिछले दिनों हमारी एक कोलीग (सहकर्मी) की तरक़्क़ी (प्रमोशन) हुई तो उन्हें मुबारकबाद देने उनके ऑफ़िस गया। मुबारकबाद देते हुए मैंने कहा कि आप बहुत ख़ुशक़िस्मत हैं कि इतनी कम उम्र में इस ओहदे (पद) पर पहुँच गई हैं। कहने लगीं कि मैंने बहुत सख़्त वक़्त देखा है लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। यह अल्लाह का ख़ास करम है कि मुसलसल (लगातार) मेहनत और हिम्मत न हारने से ही सब कुछ मिला है। मैं बी.एस.सी. (B.Sc.) में थी कि वालिदा (माँ) का इंतिक़ाल हो गया। वालिद साहब (पिताजी) ने दूसरी शादी कर ली। चंद हफ़्ते सब ठीक चला मगर फिर सौतेली माँ ने अपना सौतेलापन दिखाना शुरू किया। हम सिर्फ़ दो बहन-भाई थे। भाई मुझसे बड़ा था जिसे वालिद साहब ने पाकिस्तान से बाहर पढ़ने के लिए भिजवा दिया। सौतेली माँ घर के सारे काम मुझसे करवाती थी, वालिद साहब को यह कहकर मुतमईन (संतुष्ट) कर देती थी कि इसे घरदारी (घर का कामकाज) सिखा रही हूँ, वरना अगले घर जाकर यही गिला (शिकायत) आएगा कि सौतेली थी इसलिए कुछ नहीं सिखाया। सुबह जल्दी उठकर सबके लिए नाश्ता बनाती थी, और घर की सफ़ाई करके यूनिवर्सिटी जाती थी। फिर यूनिवर्सिटी से वापस आते ही सबके लिए खाना बनाना, बर्तन धोना, कपड़े धोना वग़ैरह सब कुछ करते रात के दस-ग्यारह बज जाते थे। यह रोज़ का मामूल (नियम) था। हमारे वालिद साहब का अच्छा बिज़नेस था मगर सौतेली माँ के कहने पर अब मुझे जेब-ख़र्च भी बहुत कम मिलता था, इतना कम कि मैंने वालिद साहब से कहना ही छोड़ दिया। मोहल्ले के बच्चों को शाम को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया ताकि अपना जेब-ख़र्च बना सकूँ जिससे घर के काम मज़ीद (और ज़्यादा) रात को देर से ख़त्म होते थे। लेकिन इसका नुक़सान यह हुआ कि यूनिवर्सिटी के सेमेस्टर की फ़ीस की बारी आई तो सौतेली माँ ने वालिद साहब को कह दिया कि अब यह ख़ुद इतना कमाती है, अपनी फ़ीस ख़ुद दे सकती है। जिसके बाद मुझे मज़ीद ज़्यादा मेहनत करनी पड़ी ताकि अपनी फ़ीस भी ख़ुद जमा कर सकूँ। ज़्यादा पैसों के लिए एक जगह होम ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया तो उन बच्चों के वालिद ने तंग करना शुरू कर दिया, मजबूरन छोड़ना पड़ा।

बहनों को भाई का बड़ा सहारा होता है लेकिन भाई अपनी अय्याशियों में मसरूफ़ (व्यस्त) था। मैं जितनी भी कोशिश करती थी मगर वह मेरी बात अव्वल तो सुनता ही नहीं था, कभी सुन भी लेता था तो एक ही बात होती थी कि तुम औरतों की लड़ाइयाँ कभी ख़त्म नहीं होंगी।

वालिद साहब का सहारा था तो वह सौतेली माँ ने छीन लिया था। मेरी डिग्री होते ही सौतेली माँ ने अपने किसी रिश्तेदार के साथ मेरे रिश्ते के लिए वालिद साहब के कान भरने शुरू किए। वह नशेड़ी सा था, वाजबी (मामूली) सी तालीम (शिक्षा), मोहल्ले में ही कोई दुकान चलाता था। उम्र में भी मुझसे काफ़ी बड़ा था। मैंने इनकार किया तो सौतेली माँ ने कहना शुरू किया कि यूनिवर्सिटी में ही इसका किसी से चक्कर होगा इसलिए नहीं मान रही। अब तो मेरे दिल में आता था कि अच्छा था कि कोई होता जिससे शादी करके इस जहन्नम से निकल सकती। बड़ी मुश्किल से एम.फ़िल. (M.Phil.) की इजाज़त मिली। अपने अख़राजात (ख़र्चे) तो मैं पहले ही ख़ुद पूरे कर रही थी लेकिन एम.फ़िल. की फ़ीस ज़्यादा थी। इसलिए वालिद साहब से बहरहाल कुछ न कुछ सपोर्ट ज़रूरी थी। उनकी अच्छी माली हैसियत (आर्थिक स्थिति) की वजह से मुझे कोई स्कॉलरशिप भी नहीं मिल सकती थी। मुश्किल से एम.फ़िल. में दाख़िले की इजाज़त मिल ही गई। एम.फ़िल. के पूरा होने के क़रीब एक क्लास-फ़ेलो (सहपाठी) ने प्रपोज़ किया, मैं किसी सहारे की तलाश में थी इसलिए उसे फ़ौरन कहा कि रिश्ता भेजो। इस रिश्ते के आने पर सौतेली माँ ने तूफ़ान खड़ा कर दिया। वह-वह इल्ज़ाम लगाए कि ख़ुदा की पनाह। लेकिन मैं डटी रही। क्लास में वह लड़का काफ़ी अच्छा था। शक्ल-ओ-सूरत और अख़लाक़ (आचरण) भी मुनासिब (ठीक) था। वालिद साहब ने लड़के का घर-बार न देखा बस ऐसे ही नाराज़ होकर हाँ कर दी और कह दिया कि शादी करके जाओ और वापस कभी इस घर में न आना।

शादी बग़ैर किसी दहेज के सादगी से हुई। दहेज न लाने की वजह से लड़के की माँ और बहनों ने चंद दिनों में ही ताने देने शुरू कर दिए। मैं एक जहन्नम से निकल कर दूसरे में आ गई थी। शादी से क़ब्ल (पहले) उसने कोई वादे तो नहीं किए थे मगर मुझे इतना था कि वह मुझे प्यार और इज़्ज़त देगा। वह भी न मिले। कुछ दिनों बाद बात तानों से जिस्मानी अज़ीयत (शारीरिक यातना/मारपीट) तक पहुँच गई। मैंने जॉब की बात की तो फ़ौरन से मान गए। अच्छी जॉब मिल जाने से घर में कुछ दिन सब अच्छा रहा लेकिन कुछ महीनों बाद फिर से वही हालात। शायद उन्हें इस बात ने शेर बना दिया था कि इसका आगे-पीछे तो कोई है नहीं। बाप सौतेली माँ का हो चुका था और घर आने से मना कर चुका था। भाई ने बाहर ही किसी मेम (विदेशी महिला) से शादी कर ली थी और उसे बहन का कुछ याद ही नहीं था। जिन लड़कियों का मायका न हो वह कटी पतंग की मानिंद (तरह) होती हैं। मुझे तनख़्वाह (सैलरी) मिलते ही शौहर सारी ले लेता था। घर में सास की मर्ज़ी चलती थी। मुझे जॉब से वापस आकर घर के सारे काम भी करने होते थे। इसके बावजूद भी ताने और मार-कुटाई हाथ आती थी। हर माह (महीने) इतना कमा के देती थी फिर भी दहेज न लाने वाले ताने ख़त्म नहीं होते थे। बाप और भाई से तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा) न मिलने के बाद मुझे शौहर से यह तवक़्क़ो (उम्मीद) थी मगर अब वह भी ख़त्म हो चुकी थी। शौहर से कई बार बात की, उसे सब बताया मगर उसे सिर्फ़ यह था कि मेरा मायका तो है नहीं तो कहाँ जाऊँगी। जब सब कुछ बर्दाश्त से बाहर हो गया तो मैंने ख़ुला (तलाक़) के लिए केस दायर कर दिया। जब तक ख़ुला का केस चलता रहा, शौहर के घर ही रही, उसे कहती रही कि आप अभी हालात को बेहतर कर लो तो मैं ख़ुला का केस वापस ले लूँ मगर उसे था कि मैं ख़ुला नहीं लूँगी बल्कि सिर्फ़ उसे ब्लैकमेल करने के लिए यह सब कर रही हूँ। मजबूरन ख़ुला ले ली।

ख़ुला लेकर वालिद साहब के पास पहुँची तो सौतेली माँ ने घर में ही दाख़िल न होने दिया। वालिद साहब को कॉल करती रही मगर वह अटेंड नहीं कर रहे थे। वहीं दरवाज़े पर उनका इंतज़ार किया मगर जब वह आए तो मेरी बात सुने बग़ैर ही अंदर चले गए और दरवाज़ा बंद कर लिया। भाई से भी बात की उन्हें सब बताया मगर उनका कहना था कि अपने मसले (समस्याएँ) ख़ुद हल करो।

वहाँ से एक गर्ल्स हॉस्टल में आ गई। जॉब की वजह से पैसे का मसला नहीं था इसलिए एक-दो साल मैं हॉस्टल में ही रही।

मेरे एक कोलीग को किसी तरह मेरे हालात का पता चला जिसकी पहली बीवी फ़ौत हो (गुज़र) गई थी, उसके दो छोटे-छोटे बच्चे थे। उसने एक बुज़ुर्ग की मदद से मुझसे रिश्ते की बात की। उसकी काफ़ी कोशिश के बाद मैं निकाह पर राज़ी हो गई। अब मुझे क़ुदरत ने वहीं ला खड़ा किया था जहाँ कुछ अर्सा क़ब्ल (कुछ समय पहले) मैं और मेरी सौतेली माँ थी। दोनों बच्चे सहमे हुए थे। लड़का बड़ा था और लड़की छोटी। मैंने उन्हें हक़ीक़ी (सगी) माँ जैसा प्यार देने का सोचा। मेरे जो बच्चे कभी-कभी आपके बच्चों के साथ यूनिवर्सिटी के ग्राउंड में खेलते हैं वह मेरे शौहर की पहली बीवी से हैं। बच्चों को ऐसा प्यार दिया है कि शायद ही किसी को मालूम हो कि मेरे सगे बच्चे हैं या सौतेले। मेरा शौहर नहीं चाहता कि अभी मेरी औलाद हो, शायद उसे ख़ौफ़ (डर) है कि मेरी अपनी औलाद हो गई तो मैं इन बच्चों को पहले जैसा प्यार नहीं दूँगी। इसलिए मैंने इस पर कभी ज़ोर नहीं दिया। वालिद साहब बूढ़े होने के बाद कारोबार के क़ाबिल नहीं रहे, भाई मुल्क (देश) से बाहर है। मेरे इस शौहर की तनख़्वाह अच्छी है इसलिए उसने मेरी तनख़्वाह के बारे में कभी नहीं पूछा। अपनी तनख़्वाह में से एक बड़ा हिस्सा अपने बाप और सौतेली माँ के अख़राजात (ख़र्चों) के लिए भिजवा देती हूँ। बाप पैसे तो ले लेता है मगर अभी भी नाराज़ है, बात नहीं करता मुझसे न मिलता है वरना उसकी मज़ीद ख़िदमत (और ज़्यादा सेवा) भी करती।

शौहर से प्यार मिला है। इन दो बच्चों की सूरत में अल्लाह ने औलाद भी दे दी है। अब यह तरक़्क़ी भी मिल गई है, अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है। हालात कभी एक जैसे नहीं रहते। इतने मुश्किल हालात के बावजूद मैंने कभी भी ख़ुदकुशी (आत्महत्या) का नहीं सोचा। मैंने कभी नहीं सोचा कि मेरे साथ जो भी ज़ुल्म हुए उनका बदला मैं किसी से भी लूँ। आज अल्लाह का शुक्र है कि मेरी ज़िंदगी में सुकून है।

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हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) का एक वाक़या और पिता के मित्रों का सम्मान
लेख

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) का एक वाक़या और पिता के मित्रों का सम्मान

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) एक बार सफ़र पर जा रहे थे, ग़ालिबन (शायद) हज या उमरे का सफ़र था। साहिबे-हैसियत (धनी) अरबों की आदत के मुताबिक़, आप सफ़र पर जाते हुए सवारी के ऊँट के साथ एक खच्चर नुमा गधा भी ले गए (अरबों के गधे हमारे यहाँ के गधों की तरह नहीं होते, बल्कि हमारे यहाँ के खच्चर...