अपने आप को हर उस गुनाह से बचाएं जो आपके और आपकी दुआओं के बीच खड़ा हो जाता है। याद रखें, जब तक आप गुनाहों की ज़िंदगी में रहेंगे, आपकी दुआएं क़बूलियत का दर्जा हासिल नहीं कर सकेंगी।
"तो हे आँख वालों! इबरत (सीख) हासिल करो।"
यह उन लोगों के लिए एक सबक है जो "मेरा जिस्म, मेरी मर्जी" का नारा लगाते हैं।
मर्जी भी उसी की थी और जिस्म भी उसी का था, मगर उसके बाद जो हुआ वह सन्नाटे से गूंजता हुआ एक कमरा था। बंद दरवाजे के पीछे महीनों से खामोश पड़ी एक लाश थी, और आस-पास न कोई रोने वाली आँख...