बहर-ए-ग़फ़्लत यह तेरी हस्ती नहीं,
देख जन्नत इस क़दर सस्ती न...
Ummah Post
By Mohd
3 December, 2020

बहर-ए-ग़फ़्लत यह तेरी हस्ती नहीं,

देख जन्नत इस क़दर सस्ती नहीं।

रहगुज़र दुनिया है यह बस्ती नहीं,

जाये-ऐश-ओ-इशरत-ओ-मस्ती नहीं।

इक दिन मरना है आख़िर मौत है,

करले जो करना है आख़िर मौत है।

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शेख अबू हाज़िम की हक़-गोई और सुलेमान बिन अब्दुल मलिक का रो पड़ना
लेख

शेख अबू हाज़िम की हक़-गोई और सुलेमान बिन अब्दुल मलिक का रो पड़ना

सुलेमान बिन अब्दुल मलिक, जो बनू उमय्या का बादशाह था, ने एक मर्तबा शैख़-उल-हदीस अबू हाज़िम (रहमतुल्लाह अलैह) से दरयाफ़्त (पूछा) किया कि इसकी क्या वजह है कि हम लोग दुनिया को पसंद और आख़िरत को नापसंद करते हैं? आपने बरजस्ता (तुरंत) जवाब दिया, "क्योंकि तुम लोगों ने अपनी दुनिया को आबाद किया और अपनी आख़िरत को...