इमाम मालिक रहमतुल्लाही अलैहि और अज़मत-ए-रसूल (ﷺ) .... !!...
Ummah Post
15 October, 2024

इमाम मालिक रहमतुल्लाही अलैहि और अज़मत-ए-रसूल (ﷺ) .... !!

इतिहास में दर्ज है कि एक बार हज़रत इमाम मालिक रहमतुल्लाही अलैहि से उनके ज़माने के बादशाह अमीर-उल-मोमिनीन अबू जाफ़र अल-मंसूर ने मस्जिद-ए-नबवी में किसी सिलसिले में बहस की और उसकी आवाज़ बुलंद (तेज़) हो गई, तो इमाम मालिक रहमतुल्लाही अलैहि ने फ़रमाया कि, "ऐ अमीर-उल-मोमिनीन! इस मस्जिद में आवाज़ बुलंद न करें। अल्लाह ने सहाबा की एक जमात को यह अदब सिखाया है: { لَا تَرْفَعُوْا أَصْوَاتَکُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ } तर्जुमा: (अपनी आवाज़ को नबी की आवाज़ से बुलंद न करो) और एक दूसरी जमात की तारीफ़ इस तरह की: { اِنَّ الَّذِیْنَ یَغُضُّوْنَ أَصْوَاتَھُمْ عِنْدَ رَسُوْلِ اللّٰہِ } तर्जुमा: (जो लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास अपनी आवाज़ को पस्त (धीमा) कर लेते हैं)।" और फिर फ़रमाया कि, "आप ﷺ की अज़मत (महिमा/सम्मान), वफ़ात (देहांत) के बाद भी उसी तरह है जैसे आपकी ज़िंदगी में हुआ करती थी।"

(तरतीब अल-मदारिक लि-क़ाज़ी अयाज़: 1/68, ख़ुलासत अल-वफ़ा लि-समहूदी: 1/51)

Share this article
अध्ययन का अनोखा लाभ
लेख

अध्ययन का अनोखा लाभ

शेख़ सलमान अल-औदा अपनी किताब "ज़ंज़ाना" में लिखते हैं कि: एक मर्तबा मैंने अपने शेख़ से शिकायत की कि: मैंने एक किताब पढ़ी लेकिन मुझे उसमें से कुछ भी याद नहीं रहा, चुनाँचे उन्होंने मुझे एक खजूर दी और फ़रमाया: लो यह चबाओ! फिर मुझसे पूछा: क्या अब तुम बड़े हो गए? मैंने कहा: नहीं, फ़रमाया: लेकिन यह खजूर...