*मुस्कुराएं*

हमारे उस्ताद जी कहते हैं....
एक मर्तबा मैं...
Ummah Post
15 October, 2024

*मुस्कुराएं*

हमारे उस्ताद जी कहते हैं....

एक मर्तबा मैं इम्तिहान के पेपर चेक कर रहा था....

उसूले-फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र के सिद्धांत) का पर्चा था...

एक सवाल में "इज्मा" (धार्मिक आम सहमति) की परिभाषा और उसकी क़िस्में पूछी गई थीं....

एक छात्र ने यह सवाल कमाल का हल किया...

पूरे तीन से चार सफ़्हे (पन्ने) उसने इसके जवाब पर लगाए...

उसकी परिभाषा... उसकी क़िस्में... हर-हर क़िस्म का अलग-अलग हुक्म (नियम)....; सब कुछ लिखा...

लेकिन मैंने उसे एक नंबर भी नहीं दिया...😎

हमने हैरत से पूछा, "वह क्यों उस्ताद जी?" 😳

कहने लगे, "कम्बख़्त ने 'इज्मा' को बग़ैर अलिफ़ के पढ़ कर (यानी 'जिमा' / संभोग समझकर) सारा सवाल हल किया हुआ था..." 😂😂😂

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