कुछ राहों पर आपको तन्हा (अकेले) ही चलना पड़ता है, वहाँ न तो दोस्त आपका साथ दे सकते हैं, न ही अहल-ए-खाना (परिवार वाले), यहाँ तक कि शरीक-ए-हयात (जीवनसाथी) भी नहीं। वहाँ आप और सिर्फ आप होते हैं।
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