कलम मेरा क़ासिर (असमर्थ) है, अल्फ़ाज़ नहीं,
मैं क्या लिखूँ ऐसी शख़्सियत के बारे में_____?
जो हर लम्हा हमें अपनी आगोश (गले) में रखते हैं_____
अपनी दुआओं में हमारी खुशियाँ और कामयाबी व कामरानी की दुआएं मांगते हैं______
रात के अंधेरे में जब सारी दुनिया सो रही होती है तो, ये हमारे हक़ में हलाल रिज़्क़ की बरकतें मांगते हैं___
जब हम ग़मगीन होते हैं तो सीने से लगाते हैं____
जब हम दर्द में मुब्तिला होते हैं तो खुद से ज़्यादा इनको परेशान देखते हैं____
इस फ़ानी (नश्वर) दुनिया में इस तरह से बेइंतहा और बेलोस (निःस्वार्थ) मोहब्बत करने वाली शख़्सियत सिर्फ़ और सिर्फ़ वालदैन (माता-पिता) हैं___
तो क्यों न हम कहें उनके हक़ में:
*रब्बिर हमहुमा कमा रब्बयानी सगीरा* (ऐ मेरे रब! उन दोनों पर रहम फरमा जैसा कि उन्होंने बचपन में मुझे पाला)
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✍🏻.......बिन्ते शमशीर 🤍✨