*मगरमच्छ के आँसू...*
यह मुहावरा उर्दू भाषा में बहुत मशहूर है, लेकिन मैंने कभी इस पर ग़ौर नहीं किया था। आज कहीं पढ़ा तो सोचा कि आपके साथ भी इस मुहावरे का बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि) शेयर करूँ।
कहते हैं कि मगरमच्छ जब शिकार को अपने हलक़ तक बेदर्दी से पहुँचाता है, तब हलक़ तंग होने की वजह से निगलने में कठिनाई होती है। हलक़ पर दबाव बढ़ने से उसके आँसू निकल जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि शिकार को पानी में ले जाकर खाने के बाद, मगरमच्छ सूखी ज़मीन पर आकर आँसू बहाता है, जो उसके हाज़मे के लिए फ़ायदेमंद होता है।
लिहाज़ा, मगरमच्छ के आँसू किसी हमदर्दी के जज़्बे से नहीं होते, बल्कि ये आँसू किसी बड़ी वारदात (शिकार) का नतीजा होते हैं। कुछ लोग जो आपके साथ हमदर्दी का इज़हार करते हैं, दरअसल वही आपको तकलीफ़ देने वाले होते हैं।
इसीलिए उनके रोने को "मगरमच्छ के आँसू" कहा जाता है।