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मैं लोगों के शब्दों में उनकी चीखों क...
Ummah Post
13 November, 2024

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मैं लोगों के शब्दों में उनकी चीखों को महसूस करती हूँ...!

ख़ुदारा (भगवान के लिए)! अपने रिश्तों को दुख देना छोड़ दें...!

चेहरे बदलना छोड़ दें...!

अपने रिश्तों के सामने कुछ और, और पीछे कुछ और होना छोड़ दें...!

दोरंगी (दोगुनापन) छोड़कर यकरंग (सच्चे) हो जाएँ...!

अपने ऊंचे स्टेटस (रुतबे) के कारण अपने बाकी रिश्तों को मामूली समझना छोड़ दें...!

अपने रिश्तों की शराफ़त का नाजायज़ फ़ायदा उठाना छोड़ दें...!

जो आपकी इज़्ज़त और सम्मान में झुका हुआ है, उसे झुका हुआ ही समझें, गिरा हुआ नहीं...!

डर जाएँ उस वक़्त से जब लोगों के शब्दों की चीखें रब के अर्श (आसमान/सिंहासन) तक पहुँच जाएँ...!

या अल्लाह! हमारी इस्लाह (सुधार) कर दीजिए...!

आमीन सुम्मा आमीन या रब्बल आलमीन।

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