"बेशक दिल मुर्दा भी हो जाते हैं, और ज़िंदा भी; जब यह मुर्दा हो जाएं, तो उनको फ़राएज़ (अनिवार्य इबादत) अदा करने पर लगाओ;
फिर जब यह ज़िंदा हो जाएं, तो दिल को नफ़्ली आमाल (स्वैच्छिक इबादत) पर राग़िब करो (प्रेरित करो)!"
इमाम हसन बसरी रहिमहुल्लाह
(अज़-ज़ुह्द लिल-इमाम अहमद : 216/1)