गाने = गुनाह हैं
गाने = ग़म बढ़ाते हैं
गाने = तंगी बढ़ाते...
Ummah Post
17 November, 2024

गाने = गुनाह हैं

गाने = ग़म बढ़ाते हैं

गाने = तंगी बढ़ाते हैं

गाने = बहुत परेशान करने वाले हैं

गाने = क़ुरआन सुनने से नफ़रत पैदा करते हैं

गाने = क़ुरआन को दिल पर भारी बनाते हैं

गाने = इबादात को मुश्किल बनाते हैं

गाने = बुरे लगते हैं

गाने = दिल को दुखी करते हैं

गाने = दिल को मुर्दा करते हैं

गाने = अफ़सुर्दगी (उदासी) पैदा करते हैं

*"लेकिन क़ुरआन इन सब के बरअक्स (विपरीत) है, यह दिल को सुकून देता है, दिल को आराम पहुंचाता है और दिल की तकलीफ़ दूर करता है।"*

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अल्लाह का ख़ौफ़ और मग़्फ़िरत: सहीह मुस्लिम की एक ईमान अफ़रोज़ हदीस
लेख

अल्लाह का ख़ौफ़ और मग़्फ़िरत: सहीह मुस्लिम की एक ईमान अफ़रोज़ हदीस

एक हदीस हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मर्वी (वर्णित) है... फ़रमाते हैं कि एक मर्तबा हुज़ूर अक़्दस (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पिछली उम्मतों के एक शख़्स का वाक़िया बयान फ़रमाया... कि एक शख़्स था जिसने अपनी जान पर बड़ा ज़ुल्म किया था... बड़े-बड़े गुनाह किए थे... बड़ी ख़राब ज़िंदगी गुज़ारी थी....