*"तुम्हारा मक़ाम (स्थान) वही है जहाँ अल्लाह ने तुम्हें मसरूफ़ (व्यस्त) रखा है।"*
*किसी बुज़ुर्ग ने क्या ही ख़ूब फ़रमाया है:*
अगर तुम यह जानना चाहते हो कि अल्लाह के नज़दीक तुम्हारा मक़ाम क्या है, तो देखो वह तुम्हें किस काम में मश्गूल (व्यस्त) रखता है:
*अगर वह तुम्हें अपने ज़िक्र (स्मरण) में मश्गूल रखे,*
तो जान लो कि वह तुम्हें याद रखना चाहता है।
*अगर तुम्हें क़ुरआन में मसरूफ़ करे,*
तो समझ लो कि वह तुम से हमकलाम (बातचीत) होना चाहता है।
*अगर तुम्हें नेक आमाल (अच्छे कर्मों) में मसरूफ़ करे,*
तो जान लो कि वह तुम्हें अपने क़रीब करना चाहता है।
*अगर दुनियावी मामलात में उलझाए,*
तो यह समझो कि तुम्हें दूर कर रहा है।
*अगर तुम्हें लोगों के (आपसी) मामलात में मसरूफ़ रखे,*
तो यह जान लो कि वह तुम्हें बेवक़्त (महत्वहीन) करना चाहता है।
*अगर दुआ में मश्गूल करे,*
तो यक़ीन करो कि वह तुम्हें नवाज़ना (वरदान देना) चाहता है।
*अगर फ़ायदेमंद इल्म (ज्ञान) में मसरूफ़ करे,*
तो वह चाहता है कि तुम उसकी मआरिफ़त (पहचान) हासिल करो।
*अगर तुम्हें जिहाद फ़ी सबीलील्लाह (अल्लाह की राह में संघर्ष) में लगाए,*
तो वह तुम्हें अपने लिए चुनना चाहता है।
*अगर ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ (मानव सेवा) और भलाई के कामों में मश्गूल करे,*
तो जान लो कि वह तुम्हें अपनी मोहब्बत वाले कामों में लगा रहा है।
*और अगर तुम्हें ग़ैर-ज़रूरी कामों में मसरूफ़ करे,*
तो समझो कि तुम्हें अपनी मोहब्बत से निकाल रहा है।
*अगर तुम्हें दीन (धर्म) में तहरीफ़ (बदलाव) या ऐसे कामों में मश्गूल रखे जो उसकी नाफ़रमानी के हों,*
तो जान लो कि वह तुम्हें अपनी मोहब्बत से महरूम (वंचित) कर रहा है।
*और अगर तुम्हें अपने बंदों को तकलीफ़ और अज़ियत (पीड़ा) पहुँचाने में मसरूफ़ रहने दे,*
तो जान लो कि तुम्हें ख़ैर (भलाई) से महरूम किया जा रहा है।
*लिहाज़ा, अपने हाल पर ग़ौर करो कि तुम किस काम में मश्गूल हो, क्योंकि तुम्हारा मक़ाम वही है जहाँ अल्लाह ने तुम्हें मसरूफ़ रखा है।*
*अल्लाह अल्लाह अल्लाह*
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