एक अरब कस्टमर आया। मैंने उसका बिल बनाया, उसका सामान एक प्लास...
Ummah Post
25 March, 2025

एक अरब कस्टमर आया। मैंने उसका बिल बनाया, उसका सामान एक प्लास्टिक बैग में रखा, और निहायत अदब से उसे थमाया। खुश होकर वह दुआ देने लगा।

“اَللہُ یَتَزَوَّجَکَ مَن لَّا یُصَلِّی وَلَا یَصُوْمُ!”

(अल्लाह तुम्हारी शादी उससे करवाए जो न नमाज़ पढ़ती है न रोज़ा रखती है!)

मैं हैरान रह गया। अजीब दुआ थी!

अगले ही लम्हे वह बोला, "क़ुल आमीन, आमीन कहो!"

मैं उलझन में पड़ गया। "यह कैसी दुआ है?" मैंने हैरानी से पूछा।

वह मुस्कुराया, मेरा हाथ थामा और नरमी से कहा, "पहले आमीन कहो, फिर समझाता हूँ!"

मैं संभल कर बोला, "मैं शादीशुदा हूँ, और यह दुआ मुझे कुछ ख़ास पसंद नहीं आई!"

वह हँसा, "पसंद आएगी मेरे भाई, बस आमीन कह दो!"

उसका इसरार (जिद) देखकर मैंने कहा, "आमीन!"

तब वह क़रीब आकर सरगोशी (फुसफुसाहट) में बोला:

“حُورُ الْجَنَّةِ، لَا تُصَلِّی وَلَا تَصُوْمُ!”

(जन्नत की हूर न नमाज़ पढ़ती है न रोज़ा रखती है!)

मतलब समझ आया तो मेरे वजूद का हर-हर ज़र्रा आमीन बोल गया!

Share this article
हुज़ूर ﷺ का अपने साथियों के साथ सुलूक
लेख

हुज़ूर ﷺ का अपने साथियों के साथ सुलूक

हज़रत हुसैन बिन अली (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) फ़रमाते हैं कि मैंने अब्बा जान सैयदुना अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) से पूछा कि हुज़ूर ﷺ अपने हम-नशीनों (साथियों) के साथ कैसे रहते थे? आपने फ़रमाया: "आप ﷺ ख़ंदा-रू (हँसमुख), ख़ुश-अख़लाक़ (अच्छे आचरण वाले) और नर्म-ख़ू (नर्म स्वभाव के) थे। बद-अख़लाक़ी, सख़्त-मिज़ाजी...