"एक लरज़ता (कांपता) हाथ, एक कांपती लाठी, और उन आंखों में वह...
Ummah Post
8 April, 2025

"एक लरज़ता (कांपता) हाथ, एक कांपती लाठी, और उन आंखों में वह सवाल जो किसी को नज़र नहीं आता—

'क्या हम वाक़ई इतने बेबस हो गए?'

यह वही हाथ हैं जिन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। वही क़दम जो रातों को जागकर तुम्हारे लिए दौड़ते थे, आज दरवाज़े पर तुम्हारी राह तक रहे हैं। मगर तुम्हें फ़ुर्सत नहीं। तुम्हारे पास दुनिया की हर मसरूफ़ियत (व्यस्तता) है, सिवाय उन चेहरों को देखने के जो तुम्हारी एक मुस्कुराहट को तरस रहे हैं।

एक सूखी छड़ी कम से कम गिरने से बचा सकती है, मगर वह औलाद जो मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा न बने, वह उस छड़ी से भी बदतर है। वह माता-पिता जो जवानी में तुम्हारी हर ज़िद मानते रहे, आज तुम्हारी बेहिसी (उदासीनता) के बोझ तले दबे सिसक रहे हैं।

वक़्त पलटता ज़रूर है, एहतियात (सावधानी) कीजिए!"

Share this article
खामोश परिंदा
लेख

खामोश परिंदा

हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के दौर में एक शख़्स ने एक ख़ूबसूरत परिंदा ख़रीदा। वह जब चहचहाता तो उसकी अत्यंत दिलकश और सुरीली आवाज़ से वह शख़्स बहुत ख़ुश होता, मानो उस परिंदे की आवाज़ बहुत ही मीठी और प्यारी थी। एक दिन अचानक उस पिंजरे के पास उसी की तरह का एक और परिंदा आया और अपनी ज़बान में कुछ बातें...