"चार दिन हैं ज़िंदगी के,
फिर वही ग़ुस्ल (स्नान), कफ़न, दफ़न और फिर 'मरहूम' (दिवंगत) कहलाएंगे।
ज़िंदगी रब की रज़ा (इच्छा) पर गुज़ारें, अपनी और अपने बच्चों की बेहतरीन इस्लामी नहज (तरीक़े) पर तरबियत (परवरिश) कर दें।
क्योंकि लोग तो नहीं रहते, लेकिन उनकी अच्छी यादें और बातें हमेशा ज़िंदा रह जाती हैं...!!"