माहिर दर्ज़ी की हैरतअंगेज़ कैंची.....!

एक शीरीं-ज़बान (मी...
Ummah Post
28 April, 2025

माहिर दर्ज़ी की हैरतअंगेज़ कैंची.....!

एक शीरीं-ज़बान (मीठा बोलने वाला) आदमी रात को दोस्तों की महफ़िल में बैठकर दर्जियों के बारे में मज़ेदार क़िस्से सुना रहा था। दास्तानगो (कहानी सुनाने वाला) इतनी जानकारी रखता था कि बाक़ायदा एक अच्छा-खासा 'दर्ज़ी नामा' तैयार हो सकता था। जब उस आदमी ने दर्जियों की चोरी और मकारी से ग्राहकों का कपड़ा ग़ायब कर देने के अनगिनत क़िस्से बयान कर डाले, तो सुनने वालों में एक तुर्क, जिसे अपनी दानिश व ज़हानत (बुद्धिमत्ता) पर बड़ा नाज़ था, कहने लगा:

"इस इलाक़े में सबसे गुरु (उस्ताद) दर्ज़ी कौन सा है?"

दास्तानगो ने कहा: "वैसे तो एक से बढ़कर एक माहिरे-फ़न (कलाकार) इस शहर की गली-कूचों में मौजूद हैं, लेकिन 'पुरश' नाम का दर्ज़ी बड़ा फ़नकार है। उसके काटे का कोई मंत्र नहीं है। हाथ की सफ़ाई में ऐसा उस्ताद है कि कपड़ा तो कपड़ा, आँखों का काजल तक चुरा ले और चोरी का पता न लगने दे।"

तुर्क कहने लगा:

"लगा लो मुझसे शर्त! मैं उसके पास कपड़ा लेकर जाऊँगा और देखूँगा कि वह कैसे मेरी आँखों में धूल झोंककर कपड़ा चुराता है। मियाँ, कपड़ा तो दूर की बात है, वह एक तार भी ग़ायब नहीं कर सकेगा।"

दोस्तों ने जब यह सुना तो कहने लगे:

"अरे भाई! ज़्यादा जोश में न आओ। तुमसे पहले भी बहुत से लोग यही दावा करते आए और उस दर्ज़ी से चोट खा गए। तुम अपनी अक़्ल व ख़िरद (बुद्धि) पर इतना भरोसा न करो, धोखा खाओगे।"

महफ़िल बरख़ास्त (ख़त्म) होने के बाद तुर्क अपने घर चला गया। इसी पेच व ताब (बेचैनी) और फ़िक्र व इब्तिराब में सारी रात गुज़ारी। सुबह होते ही उसने क़ीमती अतलस (साटन) का कपड़ा लिया और पुरश दर्ज़ी का नाम पूछता-पूछता उसकी दुकान पर पहुँच गया। दर्ज़ी उस तुर्क ग्राहक को देखते ही निहायत अदब से खड़ा हो गया और तस्लीमात (सलाम) बजा लाया। दर्ज़ी ने ख़ुश-अख़लाक़ी और ताज़ीम व तक्रीम (आदर-सत्कार) का ऐसा मुज़ाहिरा किया कि तुर्क बेहद प्रभावित हुआ। दिल में कहने लगा: "यह शख़्स तो बज़ाहिर ऐसा अइयार (चालाक) और दगाबाज़ नज़र नहीं आता, लोग भी ख़ामख़ाह राई का पहाड़ बना देते हैं।" यह सोचकर उसने क़ीमती अतलस दर्ज़ी के आगे रख दी और कहने लगा:

"इस अतलस की क़बा (चोग़ा/पोशाक) मुझे सी दें।"

दर्ज़ी ने दोनों हाथ अदब से अपने सीने पर बाँधे और कहने लगा: "हुज़ूर! क़बा ऐसी सियूँगा जो न सिर्फ़ आपके जिस्म पर ज़ेब (सुंदर) देगी बल्कि दुनिया देखेगी।" उसने कपड़ा गज़ से नापा, फिर काटने के लिए जगह-जगह उस पर निशान लगाने लगा। साथ ही साथ इधर-उधर के पुरलुत्फ़ (मज़ेदार) क़िस्से छेड़ दिए। हँसने-हँसाने की बातें होने लगीं, जिनमें तुर्क को बेहद दिलचस्पी हो गई। जब दर्ज़ी ने उसकी दिलचस्पी देखी, तो एक मज़ाकिया लतीफ़ा (चुटकुला) सुनाया, जिसे सुनकर तुर्क हँसने लगा। तुर्क की छोटी-छोटी आँखें हँसते-हँसते और बंद हो गईं। दर्ज़ी ने झटपट कपड़ा काटा और जाँघ के नीचे ऐसा दबाया कि ख़ुदा की ज़ात के अलावा और कोई न देख सका। ग़रज़ यह कि इस पुरलुत्फ़ दास्तान-सराई (क़िस्सागोई) में तुर्क अपना असल मक़सद और दावा भूल बैठा। किधर की अतलस और कहाँ की शर्त? हँसी-मज़ाक में तुर्क सब चीज़ों से ग़ाफ़िल (बेख़बर) हो गया। तुर्क दर्ज़ी से कहने लगा:

"ऐसी ही मज़ेदार कोई और बात सुनाओ!"

दर्ज़ी ने फिर चर्ब-ज़बानी (वाकपटुता) का मुज़ाहिरा किया। तुर्क इतना हँसा कि उसकी आँखें बिल्कुल बंद हो गईं; होश व हवास रुख़सत और अक़्ल व ख़िरद अलविदा हो गई। इस मर्तबा दर्ज़ी ने फिर कपड़ा काटकर जाँघ के नीचे दबा लिया। तुर्क ने चौथी बार मज़ाक का तक़ाज़ा (मांग) किया तो दर्ज़ी को कुछ हया (शर्म) आ गई और कहने लगा: "मज़ीद (और) तक़ाज़ा न कीजिए, अगर हँसी की कोई और बात कहूँगा तो आपकी क़बा तंग हो जाएगी (कपड़ा कम पड़ जाएगा)।"

यह हिकायत (कहानी) बयान करने के बाद मौलाना रूमी रहमतुल्लाही अलैहि नसीहत फ़रमाते हैं कि जानते हो वह तुर्क कौन था? दगाबाज़ दर्ज़ी कौन था? अतलस क्या है? और हँसी-मज़ाक क्या है? कैंची क्या है और क़बा क्या चीज़ है?

सुनो!

वह ग़ाफ़िल तुर्क तुम्हारी ज़ात (स्वयं तुम) है, जिसे अपनी अक़्ल व ख़िरद पर बड़ा भरोसा है।

वह अइयार और धोखेबाज़ दर्ज़ी यह दुनिया-ए-फ़ानी (नश्वर संसार) है।

हँसी-मज़ाक तुम्हारी नफ़्सानी जज़्बात (सांसारिक इच्छाएँ) हैं।

तेरी उम्र अतलस (कपड़े) की तरह है, जिस पर दिन-रात दर्ज़ी की कैंची की तरह चल रहे हैं।

दिललगी का शौक़ तेरी ग़फ़्लत (लापरवाही) है।

अतलस की क़बा तुझे भलाई और नेकी के लिए सिलवानी थी, वह फ़ुज़ूल मज़ाक और क़हक़हों में तबाह व बर्बाद हो गई।

ऐ अज़ीज़! अपने होश व हवास दुरुस्त कर, ज़ाहिर (बाहरी रूप) को छोड़, बातिन (आंतरिक रूप) की तरफ़ तवज्जो (ध्यान) कर। तेरी क़ीमती उम्र की अतलस को रात-दिन की कैंची से दुनिया का मकार दर्ज़ी टुकड़े-टुकड़े करके चुराए जा रहा है और तू हँसी-मज़ाक में मसरूफ़ (व्यस्त) है......!

— हिकायत-ए-रूमी

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