"मेरे बच्चे! अपना ख़्वाब अपने भाइयों को न सुनाना, कहीं वे तुम्हारे ख़िलाफ़ कोई साज़िश न रचने लगें।"
(सूरह यूसुफ़)
हर किसी के सामने अपनी नेमतों (बरकतों) का ज़िक्र न किया कीजिए, आपकी बात सुनने वाला हर शख़्स आपको पसंद करने वाला नहीं होता। अपने आस-पास वालों के लिए खुली किताब बनकर न रहें, चाहे वे आपके कितने ही क़रीबी हों, यहाँ तक कि चाहे वे घर वाले ही क्यों न हों...
अपने कुछ राज़ (रहस्य) छुपाकर रखिए। क्योंकि न तो हर किसी के पास यूसुफ़ की क़मीज़ होगी और न ही आपके पास याक़ूब जैसा सब्र और ईमान होगा।