"ऐ नफ़्स-ए-बेरहम (हे निर्दयी मन)! ज़िंदगी का एक और साल बीत गया, तूने कब मुझे अपनी क़ैद से रिहाई देनी है।"
Ummah Post
"ऐ नफ़्स-ए-बेरहम (हे निर्दयी मन)! ज़िंदगी का एक और साल बीत गया, तूने कब मुझे अपनी क़ैद से रिहाई देनी है।"