मेरी नाक़िस (दोषपूर्ण) राय में!?
***
यह एक सुखद संयोग है क...
Ummah Post
18 June, 2025

मेरी नाक़िस (दोषपूर्ण) राय में!?

***

यह एक सुखद संयोग है कि आज एक के बाद एक दो अत्यंत आदरणीय विद्वानों के लेखों में विनम्रता के तौर पर यह प्रसिद्ध वाक्य नज़र से गुज़रा:

"मेरी नाक़िस राय में।"

मुझ तुच्छ (बंदा-ए-नाचीज़) की राय में यह अभिव्यक्ति कुछ उचित नहीं है।

सोचिए, जब आप खुद अपनी बात को नाक़िस (दोषपूर्ण या कमतर) कह रहे हैं, तो फिर उसे व्यक्त करने का औचित्य ही क्या रह जाता है? और कोई श्रोता या पाठक इसे गंभीरता से क्यों लेगा?

याद रहे कि "नाक़िस" का अर्थ ही दोषपूर्ण, अपरिपक्व, ख़राब और कमतर होता है। इसलिए जिस बात को आप प्रमाण या दलील के रूप में प्रस्तुत कर रहे हों, उसे स्वयं ही त्रुटिपूर्ण कहना (भले ही आपका यह उद्देश्य न हो) उचित तो नहीं है।

विनम्रता व्यक्त करने के लिए यह कहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा:

"मेरी आजिज़ाना (विनम्र) राय में।"

बल्कि इससे भी अधिक सुंदरता इसमें है कि विनम्रता का संबंध राय से नहीं, बल्कि स्वयं अपनी ज़ात से जोड़ा जाए, जैसे:

"मुझ नाचीज़ की राय में।"

*

Share this article
अमानत व दियानत की आला तरीन मिसाल
लेख

अमानत व दियानत की आला तरीन मिसाल

नाज़िम नदवतुल उलमा हज़रत मौलाना बिलाल अब्दुल हई साहब हसनी नदवी ज़ीद मजदुहू ने दारुल उलूम के साबिक़ मोहतमिम हज़रत उस्ताज़ डॉक्टर मौलाना सईदुर्रहमान साहब आज़मी नदवी रह. के हवाले से यह सराहत फ़रमाई कि सख़्त जिस्मानी ज़ोअफ़ के सबब हज़रत मोहतमिम साहब पिछले ढाई साल से दारुल उलूम आने से क़ासिर रहे, इस दौरा...