हमज़ा और ताज़ीमी अफ़आल (आदरसूचक क्रियाएं):
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"आप खाना खा लीजिए", इस जुमले (वाक्य) में मामूली बात को कैसे सलीके और तमीज़ के साथ कहा गया है। ऐसे जुमलों से मालूम होता है कि कहने वाला किस क़दर महज़ब (शिष्ट) है। खा लीजिए, कर दीजिए, सुन लीजिए, यह फ़ेल (क्रिया) की ताज़ीमी (आदरसूचक) सूरतें हैं। याद रखने की बात यह है कि ऐसे ताज़ीमी फ़ेलों में आख़िर में दो 'ये' (یی) होती हैं। जैसे "रखना" मस्तर (Infinitive) है, इससे "रखिए" बनेगा (ر کھ ی ے)। ऐसे फ़ेलों में हमज़ा (ء) नहीं आएगा। इसे अगर "رکھئے" या "رکھئیے" लिखा जाए तो यह सही इमला (वर्तनी) नहीं होगा। मिसाल के तौर पर ऐसे कुछ फ़ेल लिखे जाते हैं:
देखिए, पीजिए, दीजिए, लीजिए, पढ़िए, लिखिए, चलिए, उठिए, बैठिए, लाइए, खाइए, जाइए, सुनाइए, उठाइए, उड़ाइए, उबालिए, उतारिए, निकालिए, फिरिए, पूजिए, लेटिए, लौटिए, सोइए, धोइए, रोइए, खोलिए, सूँघिए, सोचिए।
शायर: दिन हँस के काट दीजिए, हिम्मत न हारिए
शायर: बिगड़े हुए को आह कहाँ तक सँवारिए
शायर: दरवाज़ा खुलने का नहीं, घर को सुधारिए
शायर: नातिक़ा सर ब गरेबाँ कि इसे क्या कहिए
शायर: ख़ामा अंगुश्त ब दन्दाँ कि इसे क्या लिखिए
शायर: पढ़िए दरूद हुस्न-ए-सबीह व मलीह देख
शायर: चाहिए अच्छों को, जितना चाहिए
शायर: रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
एक मिसाल (कहावत) है: अपनी रान खोलिए, आप लाजों मरिए।
हाँ, एक बात यह भी नज़र में रहना चाहिए कि लाइए, खाइए जैसे ताज़ीमी फ़ेल या खोइए, सोइए जैसे ताज़ीमी फ़ेल; इनमें भी आख़िर में दो 'ये' हैं। इनमें हमज़ा जो आया है, वह पहली 'ये' से पहले आया है। इसको यूँ देखिए कि "सोचिए" में तीसरा अक्षर 'चे' (च) है और आख़िर में दो 'ये' हैं (سو چ ی ے), इसी तरह "सोइए" में आख़िर में दो 'ये' हैं और तीसरा अक्षर हमज़ा है (سُ व ءِ य ے)। जिस तरह "सोचिए" में 'चे' आया है, उसी तरह "सोइए" में हमज़ा आया है। या जिस तरह "जानिए" में 'नून' (न) आया है (جانِ ی ے), उसी तरह मिसाल के तौर पर "लाइए" में हमज़ा आया है (لا ءِ ی ے)।
बस याद रखने की असल बात यह है कि ताज़ीमी फ़ेलों के आख़िर में हमेशा दो 'ये' (یی) होती हैं।
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किताब: इबारत कैसे लिखें (सफ़ा नंबर 103 से 104)
मुसन्निफ़ (लेखक): रशीद हसन ख़ान
इंतख़ाब (चयन): इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप