मैंने शब्दकोश (लुग़ात) की कई किताबों का रुख किया और हर उस शब...
Ummah Post
5 October, 2024

मैंने शब्दकोश (लुग़ात) की कई किताबों का रुख किया और हर उस शब्द को इकट्ठा किया जिससे (किसी की) प्रशंसा और तारीफ़ की जा सकती हो, इस उम्मीद पर कि मैं ज्ञान (علم/इल्म) की इन शब्दों में तारीफ़ कर सकूँ। लेकिन मैंने उसे (ज्ञान को) इन सब से बढ़कर पाया (यानी मुझे कोई ऐसा शब्द ही नहीं मिला जिससे मैं ज्ञान की वैसी तारीफ़ कर सकूँ जैसा उसका हक़ है)। चुनाँचे मैं अंतर्ज्ञान (وجدان/विजदान) के शब्दकोश की तरफ लौट आया और उसके प्रस्तावना (दीबाचा) में यह दो शब्द थे कि "इंसान ज्ञान के बिना इंसान ही नहीं होता" (यानी बिना ज्ञान के इंसान और जानवर में कोई अंतर नहीं है)।

(अल-नवाह फी हुक़ूल अल-हयात: 52)

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शेख अबू हाज़िम की हक़-गोई और सुलेमान बिन अब्दुल मलिक का रो पड़ना
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शेख अबू हाज़िम की हक़-गोई और सुलेमान बिन अब्दुल मलिक का रो पड़ना

सुलेमान बिन अब्दुल मलिक, जो बनू उमय्या का बादशाह था, ने एक मर्तबा शैख़-उल-हदीस अबू हाज़िम (रहमतुल्लाह अलैह) से दरयाफ़्त (पूछा) किया कि इसकी क्या वजह है कि हम लोग दुनिया को पसंद और आख़िरत को नापसंद करते हैं? आपने बरजस्ता (तुरंत) जवाब दिया, "क्योंकि तुम लोगों ने अपनी दुनिया को आबाद किया और अपनी आख़िरत को...