"मसरूफ़ (व्यस्त) तो सभी लोग हैं।
कुछ थक रहे हैं अपनी आख़िरत (परलोक) बनाने को,
और कुछ थक रहे हैं इसे तबाह करने को।
जन्नत तो सभी चाहते हैं...
पर कुछ थक रहे हैं दुनिया को जन्नत बनाने को...!!
और कुछ थक रहे हैं हक़ीक़ी (वास्तविक) जन्नत पाने को...!!
दो विभिन्न अंदाज़-ए-ज़िंदगी (जीवनशैली) हैं...
दो विभिन्न अंजाम (परिणाम) हैं..."
- मनक़ूल (उद्धृत)