*ईज़ा-ए-मुस्लिम (मुसलमान को तकलीफ़ पहुँचाने) की आम सूरतें*...
Ummah Post
30 August, 2025

*ईज़ा-ए-मुस्लिम (मुसलमान को तकलीफ़ पहुँचाने) की आम सूरतें*

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*ज़बान से ईज़ा (तकलीफ़)*

ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई), चुग़ली, गाली-गलौज, सख्त लहजा, तंज़िया (व्यंग्यात्मक) अलफ़ाज़।

*दिल आज़ारी*

किसी को कमतर समझना, इज़्ज़त-ए-नफ़्स (आत्मसम्मान) को मजरूह (ठेस) करना, बेवजह डांट-डपट।

*झूठ और फ़रेब*

लेन-देन या वादों में धोखा देना।

*बदगुमानी और तोहमत*

बिला तहक़ीक़ (बिना जांच के) इल्ज़ाम लगाना या नीयत पर हमला करना।

*माली ईज़ा*

क़र्ज़ अदा न करना, मज़दूर की मज़दूरी रोकना, नाज़ायज़ मुनाफ़ा ख़ोरी।

*जिस्मानी ईज़ा*

मार-पीट, धक्का देना, बिलावजह सख़्ती करना।

*हुक़ूक़ की पामाली (अधिकारों का हनन)*

पड़ोसी के हुक़ूक़ नज़रअंदाज़ करना, रास्ता तंग करना, शोर व तकलीफ़ देना।

*अहद शिकनी (वादा ख़िलाफ़ी)*

वादा ख़िलाफ़ी, मुआहदे (समझौते) तोड़ना।

*ज़ातिया अशिया (निजी चीज़ों) का नाहक़ इस्तेमाल*

किसी की चीज़ बग़ैर इजाज़त इस्तेमाल करना या नुक़सान पहुँचाना।

*नाइंसाफ़ी व ज़ुल्म*

इख़्तियारात (अधिकारों) या ताक़त का ग़लत इस्तेमाल, कमज़ोर को दबाना।

*यह वो सूरतें हैं जो हमारे घरों, इदारों (संस्थानों), बाज़ारों और मोहल्लों में रोज़मर्रा दिखाई देती हैं। इनके सद्दे-बाब (रोकथाम) से ही मुआशरा (समाज) राहत व सुकून का गहवारा बन सकता है।*

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बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता
लेख

बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता

मुझे याद है कि देवबंद में जब मेरी उम्र तक़रीबन दस-बारह साल थी, एक दिन फज्र की नमाज़ के वक़्त सख़्त आंधी, मूसलाधार बारिश और गरज-चमक की बिना पर (वजह से) वालिद साहब (मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब) मस्जिद तशरीफ़ न ले जा सके और नमाज़ घर में ही अदा फ़रमाई। उधर दादा अब्बा, जो मस्जिद के आशिक़ और नमाज़ बा-जमात क...