एक उसूल (सिद्धांत) ज़हन में रख लें कि मियां-बीवी की तमन्ना यही होती है कि हम एक बन जाएं। जिस्म एक हो जाएं, हम एक-दूसरे पर कुर्बान हों, हम एक-दूसरे से प्यार-मोहब्बत की जिंदगी गुजारें, हमारे दिल एक हो जाएं; इसलिए यह बात अपने दिलों में लिख लीजिए: "जब नेक बनोगे तब एक बनोगे।" जब तक तबियतों में नेकी नहीं आएगी, दिल एक नहीं बन सकते। नेक बनोगे तो एक बनोगे, इसलिए मियां (पति) को चाहिए कि वह भी नेक बने, उसके दिल में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा (ईश्वर का डर) हो और बीवी के दिल में भी ख़ौफ़-ए-ख़ुदा हो। इसलिए सूरह अन-निसा को पढ़ कर देख लीजिए। आपको हर चंद आयतों के बाद 'इत्तक़ुल्लाह' (अल्लाह से डरो), 'इत्तक़ुल्लाह', 'इत्तक़ुल्लाह' का लफ़्ज़ मिलेगा। इसलिए कि अल्लाह तआला जानते थे कि जब तक मियां-बीवी के दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ नहीं होगा, ये उस वक्त तक एक-दूसरे के साथ प्यार-मोहब्बत की जिंदगी नहीं गुज़ार सकेंगे। कुछ बुज़ुर्ग फ़रमाते थे कि जो औरत एक अल्लाह की बंदी नहीं बनती, उसको फिर हज़ारों की बंदी बनना पड़ता है। अब इन दफ्तरों में काम करने वाली औरतों को देखें! बेचारी सेल्स-गर्ल बनती हैं और कैसे-कैसे ग्राहकों की अलग-अलग अंदाज़ से मिन्नत-समाजत (प्रार्थना) करती हैं।
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