*अमानतदारी (ईमानदारी) का इनाम*

किसी शहर का अमीर व रईस (शा...
Ummah Post
31 October, 2025

*अमानतदारी (ईमानदारी) का इनाम*

किसी शहर का अमीर व रईस (शासक) शादी करना चाह रहा था। उसने शहर भर में ऐलान करवा दिया कि शहर की तमाम जवान लड़कियाँ फ़लाँ दिन हमारे दरबार में हाज़िर हो जाएँ; ताकि मैं जिसे चाहूँ, उसे अपनी शरीक-ए-हयात (जीवनसाथी) के रूप में चुन सकूँ। ऐलान सुनना था कि शहर की हसीनाओं में खुशी की लहर दौड़ गई। शहर की तमाम जवान लड़कियाँ बन-सँवर कर तय शुदा दिन पर अमीर के दरबार में हाज़िर हो गईं।

दूसरी तरफ एक लड़की जो शहर के अमीर की एक मामूली सी ख़ादिमा (नौकरानी) की बेटी थी, पहले ही से उक्त अमीर पर फ़्रेफ़्ता (मोहित) थी। ऐलान सुनने के बाद उसके सर में यह धुन सवार हो गई कि शायद वह इस अमीर की बीवी बन सकती है। वह रईस की मोहब्बत में दीवानी हुई जा रही थी। लड़की का यह अजीब हाल देखकर उसकी बूढ़ी माँ रंजीदा (दुखी) थी। माँ ने बेटी को समझाया कि 'बेटी, शहर का अमीर किसी अमीर और रईस की बेटी को अपनी बीवी बनाएगा, तुमको घास नहीं डालेगा'। बेटी ने जवाब दिया कि 'माँ! आप परेशान मत होइए, कम से कम दरबार में तो हाज़िर हो जाऊँ, फिर जो होगा, देखा जाएगा'।

लड़की दरबार में हाज़िर हुई। कुछ देर बाद रईस भी जल्वा-अफ़रोज़ (उपस्थित) हो गया। उसने सबका इस्तक़बाल (स्वागत) किया। फिर उसने तमाम लड़कियों को मुख़ातिब करके कहा कि: 'मैं तुम्हारे दरमियान अभी गुलाब के बीज तक़्सीम (वितरित) करूँगा, तुम उनको ज़मीन में बोना और छह महीने बाद जब दोबारा मेरे पास आना, तो अपने हाथ में गुलाब के फूल लेकर आना'।

शहर की तमाम हसीनाएँ और ख़ादिमा की लड़की भी अमीर शख़्स से गुलाब का बीज लेकर अपने घर चली गईं। छह महीने गुज़र गए; लेकिन फूल क्या, पौधा भी नहीं उगा। लड़की ने ज्यों का त्यों बीज को ज़मीन से निकाला और शहर के अमीर के दरबार में हाज़िरी की तैयारी करने लगी। माँ ने बेटी को समझाया कि 'बेटी, अब अमीर के दरबार में जाने का कोई फ़ायदा नहीं; बल्कि अंदेशा (डर) है कि तुम वहाँ से शिकस्ता-ख़ातिर (दिल टूटकर) वापस आओगी'। बेटी ने जवाब दिया कि 'अम्मी, आप मुझे जाने दीजिए, मैं इसी खुश्क (सूखे) बीज को लेकर रईस के दरबार में हाज़िर होऊँगी, कुछ नहीं, तो कम से कम रईस के दीदार का तो मौक़ा मिलेगा'। दीवानी लड़की की बातों और हरकतों से माँ तंग आ चुकी थी। उसने आजिज़ (विवश) होकर लड़की को उसके हाल पर छोड़ दिया।

शहर की तमाम हसीनाएँ अपने हाथों में ताज़ा, खूबसूरत और खिले हुए गुलाब के फूल लिए हाज़िर थीं, और यह लड़की वही मुर्दा बीज लिए कहीं खड़ी थी। शहर के अमीर ने हर तरफ निगाह दौड़ाई, तो एक लड़की पर जाकर उसकी निगाह ठहर गई। उसने लड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मैं इस लड़की से शादी करना चाहता हूँ। यह वही लड़की थी जो गुलाब के ताज़ा फूल के बजाय मुर्दा बीज लिए हाज़िर हुई थी। शहर की हसीनाओं की चीखें निकल गईं। बोलीं कि 'यह कैसा सितम है कि फूल तो लिए हम हाज़िर हुए हैं, और शहर के अमीर शादी इस लड़की से करेंगे, जिसके हाथ में फूल के बजाय एक मुर्दा सा बीज है!'

रईस ने लड़कियों का हंगामा फ़रो (शांत) किया, सबको ख़ामोश किया और कहा कि: असल बात यह है कि मैंने तुम सबको जो बीज दिए थे, वे उगने वाले नहीं थे। तुमने ब-कमाल-ए-अय्यारी (बड़ी चालाकी से) दूसरे बीजों से गुलाब उगाए और मेरे दरबार में ले आईं। तुमने ईमानदारी के बजाय बेईमानी का सबूत दिया। और इस लड़की ने मेरे ही दिए हुए बीज से पौधा उगाने की कोशिश की। नहीं उगा, तो वह मेरा ही बीज लेकर हाज़िर हो गई। उसने ईमानदारी और सच्चाई का सबूत दिया। मैं ईमानदार लड़की से शादी करना चाहता हूँ, बेईमान हसीनाओं और नाज़नीनों से नहीं'। फिर शहर के अमीर ने शान व शौकत से उस लड़की से शादी रचाई, और इस तरह एक ग़रीब ज़ादी (ग़रीब की बेटी) शहर के अमीर की बीवी बन गई।

इस कहानी से एक सबक़ यह मिलता है कि सच्चाई और ईमानदारी इंसान को कहीं से कहीं पहुँचा सकती है। दूसरा सबक़ यह मिलता है कि असल चीज़ अमानतदारी है, हुस्न व ख़ूबसूरती माध्यमिक (दूसरे दर्जे की) चीज़ है।

(एक अरबी तहरीर का अनुवाद)

अनुवादक: ख़ालिद सैफ़ुल्लाह सिद्दीक़ी

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