*"व बिसोमि ग़दिन नवैतु मिन शहरि रमज़ान"*
यह सहरी की दुआ तो...
Ummah Post
18 February, 2026

*"व बिसोमि ग़दिन नवैतु मिन शहरि रमज़ान"*

यह सहरी की दुआ तो हरगिज़ नहीं है,

बल्कि यह रोज़े की नीयत (इरादा) है।

और यह अल्फ़ाज़ (शब्द) न तो सुन्नत हैं, न साबित हैं, न मख़सूस (विशेष) हैं और न ही लाज़िम (अनिवार्य) हैं,

बल्कि ज़्यादा से ज़्यादा जाइज़ (अनुमेय) हैं।

इसलिए इन अल्फ़ाज़ के साथ भी रोज़े की नीयत करना दुरुस्त (सही) है और किसी और ज़बान में भी नीयत करना दुरुस्त है,

बल्कि ज़बान से नीयत करना ज़रूरी भी नहीं, असल नीयत तो दिल की होती है...!

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