समाज की एक बड़ी कमज़ोरी यह है कि कभी-कभी बड़ों या उम्र में हमसे ज़्यादा लोगों की ग़लत बात या जहालत को सिर्फ़ इसलिए क़बूल कर लिया जाता है कि वे बड़े हैं।
इस्लाम में बड़ों का एहतराम ज़रूर है, लेकिन एहतराम का मतलब यह नहीं कि उनकी हर बात को दुरुस्त मान लिया जाए। अगर कोई बात क़ुरआन व सुन्नत या अक़्ल-ए-सलीम के ख़िलाफ़ हो तो अदब के साथ उनकी इस्लाह की जा सकती है।
यानी बड़ों का अदब अपनी जगह, लेकिन हक़ को हक़ मानना और ग़लती को ग़लत समझना भी ज़रूरी है।