अक़्ल मारी गई, दीनदारी गई,
इस मोबाइल से परहेज़गारी (पवित्रत...
Ummah Post
27 October, 2024

अक़्ल मारी गई, दीनदारी गई,

इस मोबाइल से परहेज़गारी (पवित्रता) गई।

ख़्वाहिश-ए-नफ़्स (मन की इच्छाओं) में रात भर जाग कर,

मौत की याद की होशियारी (जागरूकता) गई।

मरने वालों पे मरने की लत में लगे (नश्वर लोगों के दीवाने बने),

ग़लबा-ए-दीन (दीन के वर्चस्व) की बेक़रारी गई।

नफ़्स की ख़्वाहिशों की ग़ुलामी मिली,

ग़ैर-महराम (पराए पुरुष/स्त्री) पे जब जान वारी गई।

दीन-बेज़ार (धर्म से विमुख) होते गए इस क़दर,

ज़िक्र व दावत, दुआ, आह व ज़ारी (रोकर गिड़गिड़ाना) गई।

हमको इदराक (समझ/ज्ञान) हुदहुद जैसा नहीं एक पल,

नेक लोगों से यारी हमारी गई।

~ हुदहुद इलाहाबादी

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