मेरे मुसलमान भाई! जब बुराई का हुक्म देने वाला नफ़्स (नफ़्स-ए-अम्मारा) तुझे अल्लाह और उसके पैगंबर (ﷺ) की नाफ़रमानी की तरफ खींचे, तो तू मौत को याद किया कर—जो लज्ज़तों (आनंद) को तोड़ने वाली है, शहवतों (वासनाओं) को काटने वाली है, और जमातों (समूहों) को जुदा-जुदा कर देने वाली है। इस बात से डर कि तुझे उस हाल में मौत आए जिस पर अल्लाह बुज़ुर्ग व बरतर (महान और सर्वोच्च) राजी न हो और तू घाटा पाने वालों (नुकसान उठाने वालों) में से हो जाए। जब अंधेरे में किसी बुराई के लिए तुझे तन्हाई (एकांत) मिले और नफ़्स-ए-अम्मारा गुनाह की तरफ दावत दे रहा हो, तो तू अल्लाह से हया कर और नफ़्स से कह दे: "जिस ज़ात (ईश्वर) ने अंधेरा पैदा किया है, यक़ीनन वह मुझे देख रही है।"
बड़ा फर्क है उस शख़्स में जो ज़ानिया (व्यभिचारिणी) की गोद में मरे, और उस शख़्स में जो ज़मीन व आसमान के रब को सज्दा करते हुए मरे। बड़ा फर्क है उस शख़्स में जो आलात-ए-मुसिकी (वाद्ययंत्रों), फ़िस्क़ (पाप) और नाफ़रमानी के बीच मरे, और उस शख़्स में जो अल्लाह वाहिद (एकमात्र अल्लाह), जज़ा व सज़ा (प्रतिफल और दंड) के मालिक का ज़िक्र करता हुआ मरे। अब इनमें से जो तू चाहता है, अपने नफ़्स के लिए पसंद कर ले।