एक बार किसी साहब ने हज़रत मदनी (रहमतुल्लाह अलैह) की दावत की,...
Ummah Post
24 November, 2021

एक बार किसी साहब ने हज़रत मदनी (रहमतुल्लाह अलैह) की दावत की, और खाने के साथ अन्य चीज़ों के अलावा थोड़ी सी खीर भी तैयार की। जब हज़रत मदनी ने उस खीर को खाया तो वह बहुत कड़वी थी। मुमकिन है कि भूलवश एलुआ (एक कड़वी जड़ी-बूटी) जैसी कोई कड़वी चीज़ उसमें गिर गई हो। हज़रत मदनी ने इस ख़्याल से कि मेज़बान (मेज़बान) को तकलीफ़ होगी और उसका दिल दुखेगा, उससे खीर के कड़वे होने का ज़िक्र नहीं किया और उससे फ़रमाया, "खीर की देगची (बर्तन) ले आओ।" वह उसे ले आया। आपने खाने में शरीक होने वाले साथियों से मुस्कुराते हुए फ़रमाया, "आज की यह तमाम खीर मेरे हिस्से की है, आप हज़रात में से कोई न खाए।" चुनाँचे आपने वह तमाम खीर इस अंदाज़ से खा ली कि मेज़बान और तमाम साथी यही समझते रहे कि खीर बहुत अच्छी लगी। लेकिन जब मेज़बान ने देगची में लगी हुई थोड़ी सी खीर तबर्रुकन (प्रसाद के रूप में) खाई, तो मालूम हुआ कि खीर तो बहुत कड़वी थी। मेज़बान और तमाम साथियों को बेहद ताज्जुब हुआ और उनकी हैरत की इंतिहा नहीं रही इस बात से कि हज़रत ने मेज़बान की दिल-आसाई (खुशी) के लिए और उसे दिल-शिकनी (दिल टूटने) से बचाने के लिए इतनी भीषण तकलीफ़ बर्दाश्त की कि बेहद कड़वी खीर सारी खा गए और किसी पर ज़ाहिर भी न होने दिया...

ये थे हमारे अकाबरीन (बुज़ुर्ग)!

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बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता
लेख

बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता

मुझे याद है कि देवबंद में जब मेरी उम्र तक़रीबन दस-बारह साल थी, एक दिन फज्र की नमाज़ के वक़्त सख़्त आंधी, मूसलाधार बारिश और गरज-चमक की बिना पर (वजह से) वालिद साहब (मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब) मस्जिद तशरीफ़ न ले जा सके और नमाज़ घर में ही अदा फ़रमाई। उधर दादा अब्बा, जो मस्जिद के आशिक़ और नमाज़ बा-जमात क...