जामिया दमिश्क (दमिश्क की मस्जिद) में एक अरब विद्वान सदक़ा (दान) की फ़ज़ीलत (महिमा) पर बातचीत कर रहे थे कि: "बन्दों को आम नेकियों (अच्छे कामों) से रोकने के लिए दो-चार शैतान ही कोशिश करते हैं, लेकिन अपने माल का सदक़ा करने से रोकने के लिए सत्तर शैतानों का झुंड पीछे पड़ जाता है कि यह आदमी किसी भी तरह से सदक़ा न करने पाए।" यह फ़ज़ीलत सुनाकर अरब विद्वान ने श्रोताओं को प्रेरित करते हुए फ़रमाया कि: "कौन है जो इन सत्तर शैतानों को शिकस्त (हार) दे और अपने मालिक़-ए-हक़ीक़ी (वास्तविक स्वामी/अल्लाह) को अपने से राज़ी करे?"
तो मजमे (भीड़) में से एक नौजवान खड़ा हुआ, उसका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया और कहने लगा कि "मैं आज सत्तर को शिकस्त-ए-फाश (करारी हार) दूँगा।" यह कहकर वह मजमे में से उठा, अपने घर आया और गेहूं का आटा जो एक बोरी में मौजूद था, उसे एक थैली में भर लिया। वह सदक़ा करने की नीयत से अभी बाहर निकल ही रहा था कि दरवाज़े पर बीवी से मुलाक़ात हो गई।
बीवी: "यह आटा लेकर कहाँ जा रहे हो?"
नौजवान: "सदक़ा करने जा रहा हूँ।"
बीवी: "चलो, जल्दी से आटा घर में रख दो और बाहर निकलो! खाने-पीने के लिए कुछ लाना तो है नहीं, और चले हैं घर का आटा सदक़ा करने।"
नौजवान ने चुपचाप आटा घर में रख दिया और वापस मजमे में आकर बैठ गया।
किसी ने पूछा कि "क्या तुमने सत्तर शैतानों को शिकस्त दे दी?"
नौजवान ने कहा, "إِنِّي هَزَمْتُ الشَّيَاطِينَ وَلَكِنْ جَاءَتْ أُمُّهُمْ فَهَزَمَتْنِي" (अनुवाद: मैंने उन सभी शैतानों को तो हरा दिया था, लेकिन उनकी माँ कहीं से आ धमकी और उसने मुझे हरा दिया)।