ज़िंदगी की पहली शर्त ज़िंदा रहना है। किसी के होने न होने से...
Ummah Post
31 December, 2023

ज़िंदगी की पहली शर्त ज़िंदा रहना है। किसी के होने न होने से ज़िंदगी रुक नहीं जाती, चलती ही रहती है। अक्सर वो लोग जिनके बिना ज़िंदगी गुज़ारना अत्यंत अनिवार्य हो जाता है, वो अचानक हमसे दूर हो जाएं या बिछड़ जाएं बग़ैर किसी वजह के, तब भी ज़िंदगी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता; वो रवां-दवां (चलती) ही रहती है। थोड़ी दुश्वार (कठिन) ज़रूर लगती है, फिर भी तमाम (ख़त्म) नहीं होती। वक़्त सब कुछ बदल देता है—लोग भी, रिश्ते भी और अहसासात (भावनाएं) भी।

अगर तुम तन्हा (अकेले) हो और वक़्त के दिल-शिकन (दिल तोड़ने वाले) लम्हात तुम्हारे महसूसात को पामाल (कुचल) कर रहे हैं, तो क्या हुआ? तुम इस दुनिया में अकेले आए थे, अकेले ही जाओगे। जब क़ुदरत ने तुम्हें अकेला ही तख़्लीक़ (पैदा) किया था, तो फिर तन्हाई से क्या घबराना। हमें भी ज़िंदगी का यह फ़लसफ़ा (दर्शन) है जो कि जितनी जल्द समझ लिया जाए, उतनी ही अज़ीयत (तकलीफ़) कम होगी।

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सच्चे मौलवी (अल्लाह वाले) की पहचान
लेख

सच्चे मौलवी (अल्लाह वाले) की पहचान

अगर किसी ख़ैमे (तंबू) पर लिखा हो 'ख़ैमा-ए-लैला' (लैला का तंबू) लेकिन उसमें झाँक कर देखा तो अंदर कुत्ता बँधा हुआ है, तो उस ख़ैमे की कोई क़द्र नहीं होगी बल्कि लोग मज़ाक उड़ाएंगे। इसी तरह मौलवी वह है जो 'मौला' (अल्लाह) वाला हो। उसके ख़ैमे से मौला की ख़ुशबू मिलनी चाहिए, यानी उसकी सोहबत (संगति) में अल...