ऐ दिल-ए-मुज़्तरिब (व्याकुल दिल)! तेरा सुकून कहाँ खो गया, तेरी ख़ुशी क्या हुई, तेरा चैन किसने बर्बाद कर दिया? तू भी अजीब है, चंद मुश्किल-उल-हुसूल (कठिनाई से मिलने वाली) ख़्वाहिशों के दरपै (पीछे) होकर तूने अपने सुकून व इत्मीनान को ही दांव पर लगा दिया!!!
देख! सुकून से बड़ी कोई दौलत नहीं, ख़ुश रहना सीख! सादा पानी पीकर, दरख़्तों (पेड़ों) और दीवारों के साए में बैठकर, इस चंद रोज़ा (कुछ दिनों की) ज़िंदगी के बाद के दायमी (शाश्वत/हमेशा रहने वाले) सुकून के मुताल्लिक़ (बारे में) सोचकर। ख़ुश रहना सीख! क़मरी (फ़ाख़्ता) और कोयल के नग़मात (गीत) सुनकर, बुलबुल के मसहूर-कुन (मंत्रमुग्ध करने वाले) नालों (गीतों) से मसहूर (मंत्रमुग्ध) होकर, परवाने को शमा के गिर्द घूमता देखकर।
चिड़ियों की चहचहाहट और दरियाओं के शोर को महसूस कर! अपने मन की दुनिया बसा! तन्हाई से दिल लगा, किताबों को अज़ीज़-अज़-जान (जान से प्यारा) दोस्त बना! मायूसी छोड़ और मेहनत से काम ले, और इन सब के साथ-साथ रब का नाम ले।