शेखुल इस्लाम हजरत मुफ्ती मोहम्मद तकी उस्मानी (मद ज़िल्लुहू) की अहले इल्म (विद्वानों) को नसीहत:
"मैंने घाट-घाट का पानी पिया है और मुल्क-मुल्क फिरा हूं। हर मुल्क और हर तबके की उर्दू, अरबी, फारसी और इंग्लिश की किताबें मैंने पढ़ी हैं। इस्लाह-ए-नफ्स (आत्म-सुधार) और जाहिर व बातिन (बाहरी और आंतरिक) की इस्लाह से मुताल्लिक हजरत थानवी (रहमहुल्लाह) के मवाइज़ (उपदेशों/खुतबात) से बढ़कर मैंने कोई किताब नहीं देखी। अपनी हद से ज्यादा मशरूफियत (व्यस्तता) के बावजूद मैं हर रोज सोने से पहले उनका तकरीबन पांच मिनट जरूर मुताला (अध्ययन) करता हूं। बाज़ औकात (कभी-कभी) दिल उनमें ऐसा लगता है कि यह मुख्तसर सा (छोटा सा) वक्त आधे घंटे तक भी चला जाता है। हजरत का कोई न कोई वअज़ (उपदेश) हमेशा मेरे सरहाने रखा रहता है। मुझे समझ नहीं आता कि मैं उनकी अफादियत (उपयोगिता) तुम्हारे दिलो-दिमाग में किस तरह उतारूं? बस! मैं आपसे दस्त-बस्ता (हाथ जोड़कर) दरख्वास्त करता हूं कि आप में से हर तालिब-ए-इल्म (विद्यार्थी) हजरत (रहमहुल्लाह) के मवाइज़ व खुतबात को अपने रोजाना के मामूलात (दिनचर्या) में शामिल कर ले। मुमकिन है कि इब्तिदा (शुरुआत) में आपका दिल उनमें न लगे, लेकिन आप ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाएंगे, इंशाअल्लाह दिल उनमें खिंचता चला जाएगा और एक ही मजलिस (बैठक) में आप उन्हें खत्म करना चाहेंगे।"
(लत़ाइफ़-ए-अशरफ़िया)