*मंचिंत या वंचित (महरूमी) वह है!*
जिसे मालूम हो कि इश्राक़/चाश्त का समय लगभग 6 घंटे है और वह 2 रकात भी न पढ़ सके, जो कि मानव शरीर के 360 जोड़ों का सदक़ा (दान) हैं।
*वंचित वह है!*
जिसे मालूम हो कि रात लगभग 11 घंटों की है और वह तहज्जुद की दो रकात भी न पढ़ सके, जिसमें लगभग 5 मिनट लगते हैं।
*वंचित वह है!*
जिसे मालूम हो कि दिन और रात में 24 घंटे होते हैं और वह क़ुरआन करीम के एक रूकू की भी तिलावत (पाठ) न कर सके, जिसमें महज़ दो मिनट लगते हैं।
*यकीनन वंचित वह है!*
जिसे मालूम हो कि ज़बान थकती नहीं, फिर भी वह दिन भर में बिल्कुल भी अल्लाह का ज़िक्र (स्मरण) न करे।
*यकीनन वंचित वह है!*
जिसे दरूद शरीफ़ पढ़ने की तौफ़ीक़ (सौभाग्य/प्रेरणा) ही न मिले।
أستغفر اللّٰہ ربّی من کلِّ ذنبٍ وّ أتوب إليه
(मैं अपने रब अल्लाह से अपने हर गुनाह की माफ़ी माँगता हूँ और उसी की तरफ़ तौबा करता हूँ।)
और इसी तरह ज़िंदगी गुज़र रही है और हम अपने आप से गाफ़िल (बेख़बर) हैं और अपने वक़्त को ज़ाया (बरबाद) करते जा रहे हैं।
या अल्लाह! हम इन महरूमियों (वंचितताओं) से तेरी पनाह माँगते हैं।
या अल्लाह! इन सुन्नतों की याददहानी (याद दिलाना) हमारे लिए, हमारे माता-पिता के लिए और जो इस याददहानी को आम (प्रसारित) करे, उन सब के लिए क़ियामत तक सदक़ा-ए-जारिया (निरंतर पुण्य) बना दे।
अल्लाह पाक हमें नेक अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और हमें गुनाहों से बचने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन सुम्मा आमीन, या रब्बुल आलमीन।
لا حول ولاقوۃ الاباللّٰہ العلیّ العظیم
(अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है और न कोई क़ुव्वत, जो बहुत बुलंद और महान है।)