"जो दिन बच गए हैं, उन्हें अच्छे से गुज़ारो; ताकि जो दिन गुज़र चुके हैं, उनकी ग़लतियों की माफ़ी हो जाए;
जो बाक़ी है, उसे ग़नीमत (वरदान) समझो;
क्योंकि तुम्हें नहीं पता कि अल्लाह की रहमत (कृपा) कब आ जाए!"
इमाम हसन अल-बसरी रहमतुल्लाह अलैह
(मिन्हाज अल-क़ासिदीन: 1/343)