मल्फ़ूज़: आफ़ियत (कुशल-मंगल) को ग़नीमत (सौभाग्य) समझो
*मल्फ़ूज़ात-ए-हकीम-उल-उम्मत मुजद्दिद-उल-मिलत हज़रत मौलाना मुहम्मद अशरफ अली थानवी रहमतुल्लाह अलैह*
*आफ़ियत को ग़नीमत समझो*
इरशाद फ़रमाया कि आफ़ियत (कुशलता) और अमन (शांति) को ग़नीमत समझो और आफ़ियत और अमन ही को मांगो, हाँ अगर कोई मुसीबत खुद-ब-खुद ही पेश आए तो उसमें सब्र व इस्तक़लाल (धैर्य और दृढ़ता) से काम लो, यही सुन्नत है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आदत-ए-शरीफ़ा यही थी कि खुद किसी हादसे की तमन्ना न फ़रमाते थे, अलबत्ता हर्ब (जंग) का मौक़ा होता था तो जो उसके मुनासिब तदबीरें (उपाय) हैं वह इख़्तियार करते थे।
(313 अशरफ़ी जवाहरात, सफ़्हा 55)