عربی اول

میزان الصرف
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آسان منطق
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ھدایۃ النحو
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القراءۃ الواضحۃ ۲
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ھدایۃ النحو قدیم
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شرح الوقایہ جلد ۲
شرح الوقایہ جلد ۲
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 1
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مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 2
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 2
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 3
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 3

...और मलक-उल-मौत आ पहुँचा!!

...और मलक-उल-मौत आ पहुँचा!!

एक नौजवान लड़की एक सुपरमार्केट में अपने जिस्म की नुमाइश करते हुए फ़ित्ना अंगेज़ (उत्तेजक) अंदाज़ में जा रही थी। उसके अंदाज़ में ऐसी खुद-नुमाइश (दिखावा) और खुद-सताई (अहंकार) थी जैसे दुनिया उसी की वजह से पैदा की गई हो। વहाँ से एक नेक और सालेह (सज्जन) नौजवान गुज़र रहा था, उसने अज़-राह-ए-हमदर्दी (सहानुभूतिवश) कहा: "मेरी बहन! अपनी इस रवेय्ये से बाज़ आ जाओ। अगर इसी हालत में मलिक-उल-मौत (موت کا فرشتہ) तुम्हारे पास आ पहुँचा, तो अल्लाह को क्या जवाब दोगी?" इसके जवाब में वह मग़रूर (घमंडी) लड़की कहने लगी...! "अगर तुम में जुर्रत है तो अभी अपना मोबाइल निकालो और अपने रब से कॉल मिलाओ कि वह मलिक-उल-मौत को भेजे।" वह नौजवान कहता है कि: "उसने ऐसी ख़ौफ़नाक बात कही थी कि मुझे डर हुआ कहीं इस बाज़ार को ही हम पर उलट न दिया जाए। मैं डरता हुआ जल्दी से वहाँ से निकला। जब मैं बाज़ार के किनारे पर पहुँचा तो मैंने अपने पीछे चीख-पुकार और रोने-बिलखने की आवाज़ें सुनीं।" "मैं वापस मुड़ा तो देखा कि एक जगह लोग इकट्ठा हैं, यह वही जगह थी जहाँ मेरी उस लड़की से बात हुई थी। मैं वह मंज़र देखकर ठिठक गया। वह लड़की ठीक उसी जगह पर मुर्दा हालत में पड़ी थी, जहाँ उसने मलिक-उल-मौत को बुलाने का चैलेंज किया था। मैं तो उस चैलेंज के बाद फ़ौरन वहाँ से निकल गया था, लेकिन लड़की उसी वक़्त मुँह के बल गिरी और दम तोड़ दिया। क्योंकि मलिक-उल-मौत आ पहुँचा था...!" (आईनुल क़ुलूब, मुस्तफ़ा कामिल) क़ारईन-ए-केराम (प्रिय पाठकों)! यह वाक़या बिल्कुल सच्चा है और एक अरब मुल्क में पेश आया था। इस वाक़ये को तक़रीबन बारह-पंद्रह साल गुज़रे होंगे, जब यह रुनुमा (घटित) हुआ तो इसकी गूँज स्थानीय अख़बारों और मजलिसों में सुनाई दी थी। "बेशक अज़-वक़्त इंसान तकब्बुक (अहंकार) और जवानी के नशे में या दौलत व इक़्तेदार के घमंड में बेहद ग़लत बातें मुँह से निकाल देता है, उसे मालूम नहीं होता कि ऐन मुमकिन है वह क़बूलियत-ए-दुआ (दुआ स्वीकार होने) का वक़्त हो।" और उसके अलफ़ाज़ पर रब की तरफ़ से पकड़ भी मुमकिन है, इसलिए हमेशा मुँह से अच्छी बात निकालनी चाहिए... "दुआओं की क़बूलियत के सुनहरे वाक़यात" से माख़ूज़ (साभार)।

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