عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

احسان الباری لفہم البخاری
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شرح عقیدہ طحاویہ
شرح عقیدہ طحاویہ
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۱
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التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۲
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التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۳
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التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۴
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التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۵
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التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۶
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علم التصریف
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हुज़ूर ﷺ का अपने साथियों के साथ सुलूक

हुज़ूर ﷺ का अपने साथियों के साथ सुलूक

हज़रत हुसैन बिन अली (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) फ़रमाते हैं कि मैंने अब्बा जान सैयदुना अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) से पूछा कि हुज़ूर ﷺ अपने हम-नशीनों (साथियों) के साथ कैसे रहते थे? आपने फ़रमाया: "आप ﷺ ख़ंदा-रू (हँसमुख), ख़ुश-अख़लाक़ (अच्छे आचरण वाले) और नर्म-ख़ू (नर्म स्वभाव के) थे। बद-अख़लाक़ी, सख़्त-मिज़ाजी, शोर-ओ-ग़ुल, फ़ुहश-गोई (अभद्र भाषा), ऐब-जोई (दूसरों में कमियाँ निकालना) और बुख़्ल व कंजूसी से पाक थे। जो बात या काम पसंद न होता तो उससे ए'राज़ (किनारा) फ़रमाते। किसी दूसरे को पसंद होता तो उसे मना करके मायूस न करते, और कोई नापसंदीदा बात की दावत देता तो उसे क़बूल न फ़रमाते; बल्कि ख़ुश-अस्लूबी (अच्छे तरीक़े) से मना फ़रमा देते। तीन बातों से ख़ुद को महफ़ूज़ (सुरक्षित) रखते थे: (1) लड़ाई-झगड़ा, (2) तकब्बुर (अहंकार), (3) ला-यानी व बे-कार बात। और तीन बातों से लोगों को बचाए रखते थे: (1) किसी की बुराई न फ़रमाते, (2) किसी पर ऐब (दोष) नहीं लगाते थे, (3) किसी का ऐब तलाश भी नहीं करते थे। वही बात फ़रमाते जिसमें सवाब (पुण्य) की उम्मीद होती और जब आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तकल्लुम (वार्तालाप) फ़रमाते तो सहाबा सर झुकाए सरापा गोश (पूरी तरह ध्यान मग्न) होते, ऐसा लगता जैसे उनके सरों पर परिंदे बैठे हुए हैं (कि ज़रा सी जुम्बिश/हलचल से उड़ जाएँगे)। जब आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सकूत (ख़ामोशी) फ़रमाते तब सहाबा कराम बोलते। आपके सामने सहाबा कराम किसी बात पर लड़ते-झगड़ते नहीं थे और कोई आपसे बात कर रहा होता तो सब उसके फ़ारिग़ (पूरा) होने का ख़ामोशी से इंतज़ार करते, हर एक की बात ब-ग़ौर (ध्यान से) समाअत (श्रवण) फ़रमाते। सहाबा किसी बात पर हँसते तो आप ﷺ भी मुस्कुराते, वे किसी बात पर हैरत ज़ाहिर करते तो आप ﷺ भी मुतअज्जिब (आश्चर्यचकित) होते। कोई अजनबी मुसाफ़िर सख़्त लब-ओ-लहज़े में बात करता और कुछ माँगता तो आप ﷺ तहम्मुुल (धैर्य) से काम लेते, (और उसकी बातों का सब्र के साथ जवाब देते) यहाँ तक कि सहाबा कराम ऐसे किसी बदू (देहाती) को पकड़ ले आते, ताकि उसके सवालात से सहाबा को इल्मी फ़ायदा हो। हुज़ूर ﷺ फ़रमाया करते थे: 'कि किसी ज़रूरतमंद साइल (माँगने वाले) को देखो कि वह कुछ माँग रहा है तो उसकी ज़रूरत पूरी करो।' किसी के साथ हुस्न-ए-सुलूक (अच्छे व्यवहार) पर बेजा तारीफ़ सुनना पसंद न फ़रमाते थे, हाँ कलमात-ए-तशक्कुर (आभार के शब्द) अदा करने की हद तक गुंजाइश होती। किसी की बात न काटते थे, हाँ अगर कोई हद से तजावुज़ (पार) करता तो मना फ़रमा देते या वहाँ से चले जाते।" (शमाइल अल-तिर्मिज़ी: 336) (किताब: माहनामा अशरफ़ उल-जराइद हैदराबाद, सितंबर पृष्ठ: 25 नक़ल कर्ता: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)

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