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قصص النبیین الجزء الاول
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نحو میر اردو
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تسہیل الصرف ۱
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تسہیل الصرف ۲
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اشرف الانشاء اردو شرح معلم الانشاء
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علم الصیغہ جدید
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علم الصیغہ اردو
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شرح مأۃ عامل
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مفتاح العوامل شرح شرح مأۃ عامل
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हज़रत बिलाल — आशिक-ए-रसूल ﷺ

हज़रत बिलाल — आशिक-ए-रसूल ﷺ

हज़रत बिलाल (रज़ि.) से एक बार किसी ने पूछा कि "आपने पहली बार हुज़ूर नबी करीम ﷺ को कैसे देखा?" हज़रत बिलाल (रज़ि.) फ़रमाते हैं कि "मैं मक्के के लोगों को बहुत ही कम जानता था। क्योंकि मैं एक ग़ुलाम था और अरब में ग़ुलामों के साथ अमानवीय (ज़ुल्म भरा) सुलूक आम था। उनकी हैसियत से बढ़कर उनसे काम लिया जाता था, इसलिए मुझे कभी इतना वक़्त ही नहीं मिलता था कि बाहर निकलकर लोगों से मिलूँ। लिहाज़ा, मुझे हुज़ूर पाक ﷺ, इस्लाम या इस तरह की किसी चीज़ का कोई इल्म (ज्ञान) नहीं था। एक बार क्या हुआ कि मुझे सख़्त बुख़ार ने आ घेरा। कड़ाके की सर्दी का मौसम था और अत्यधिक ठंड और बुख़ार ने मुझे बेहद कमज़ोर कर दिया था, इसलिए मैंने लिहाफ़ (रजाई) ओढ़ी और लेट गया। उधर मेरा मालिक यह देखने आया कि मैं जौ पीस रहा हूँ या नहीं। वह मुझे लिहाफ़ ओढ़कर लेटा देख आग-बबूला हो गया। उसने लिहाफ़ हटाया और सज़ा के तौर पर मेरी क़मीज़ भी उतरवा दी और मुझे खुले आंगन में दरवाज़े के पास बिठा दिया कि 'यहाँ बैठकर जौ पीस'। अब सख़्त सर्दी, ऊपर से बुख़ार और इतनी मशक़्क़त (मेहनत) वाला काम, मैं रोता जाता था और जौ पीसता जाता था। कुछ ही देर में दरवाज़े पर दस्तक हुई, मैंने अंदर आने की इजाज़त दी तो एक निहायत ही गंभीर और नूरानी चेहरे वाले शख़्स अंदर दाख़िल हुए और पूछा, 'जवान! क्यों रोते हो?' जवाब में मैंने झल्लाकर कहा, 'जाओ अपना काम करो, तुम्हें इससे क्या कि मैं जिस वजह से भी रोऊँ, यहाँ पूछने वाले बहुत हैं लेकिन मदावा (इलाज/मदद) कोई नहीं करता।' संक्षेप में कहें तो बिलाल ने हुज़ूर ﷺ को काफ़ी सख़्त जुमले कहे। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ये जुमले सुनकर चल पड़े। जब वह चलने लगे तो बिलाल ने तंज़िया (कटाक्ष में) कहा, 'बस? मैं न कहता था कि पूछते सब हैं मगर मदावा कोई नहीं करता।' हुज़ूर ﷺ यह सुनकर भी चलते रहे। बिलाल कहते हैं कि दिल में जो हल्की सी उम्मीद जागी थी कि यह शख़्स कोई मदद करेगा, वह भी ख़त्म हो गई। लेकिन बिलाल को क्या मालूम था कि जिस शख़्स से अब उनका वास्ता पड़ा है, वह 'रहमतुल-लिल-आलमीन' (सारे जहान के लिए रहमत) हैं। बिलाल कहते हैं कि कुछ ही देर में वह शख़्स वापस आ गया। उनके एक हाथ में गर्म दूध का प्याला और दूसरे में खजूरें थीं। उन्होंने वह खजूरें और दूध मुझे दिया और कहा, 'खाओ-पिओ और जाकर सो जाओ।' मैंने डरते हुए कहा, 'तो यह जौ कौन पीसेगा? अगर नहीं पीसा तो मालिक सुबह बहुत मारेगा।' उन्होंने कहा, 'तुम सो जाओ, यह पिसा हुआ जौ मुझसे ले लेना।' बिलाल सो गए और हुज़ूर ﷺ ने सारी रात एक अजनबी हब्शी ग़ुलाम के लिए चक्की पीसी। सुबह बिलाल को पिसा हुआ जौ दिया और चले गए। दूसरी रात फिर ऐसा ही हुआ, दूध और दवा बिलाल को दी और सारी रात चक्की पीसी। ऐसा लगातार तीन दिन तक होता रहा, जब तक कि बिलाल ठीक नहीं हो गए। यह था वह परिचय (तआरुफ़) जिसकी कोख से उस लाफ़ानी (अमर) इश्क़ ने जन्म लिया कि आज भी बिलाल को 'सहाबी-ए-रसूल' बाद में, 'आशिक-ए-रसूल' पहले कहा जाता है। आपने हुज़ूर ﷺ के विसाल (पर्दा फ़रमाने) के बाद अज़ान देना बंद कर दिया था, क्योंकि जब अज़ान में 'अश्हदु अन्न मुहम्मदर रसूलुल्लाह' तक पहुँचते, तो हुज़ूर ﷺ की याद में उनकी हिचकियाँ बंध जाती थीं और वह ज़ार-ओ-क़तार रोने लगते थे। ईसार (क़ुर्बानी) और अख़ुव्वत (भाईचारे) का यह जज़्बा इतना ताक़तवर है। अल्लाह हम सबको अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।" (मनकुल— चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)

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