عربی اول

آسان صرف حصہ ١
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تحفہ نصیر شرح نحو میر
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تنقیش النحو
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جملوں کی شناخت کیسے کریں ؟
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ریاض النحو اردو شرح تسہیل النحو (براۓ حل نحو میر)
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نحو میر
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مراد الراغبین شرح اردو مفید الطالبین مع حل ترکیب
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امین النحو
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امین الصرف
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गुलाम का आका को हकीमाना (बुद्धिमत्तापूर्ण) तमाचा

गुलाम का आका को हकीमाना (बुद्धिमत्तापूर्ण) तमाचा

जंग-ए-इस्कंदरिया (सिकंदरिया के युद्ध) में रूमी एक किले में बंद थे और मुसलमानों ने उस किले की घेराबंदी (محاصرہ) कर रखी थी। एक रोज़ रूमी मैदान में निकले और सिपहसालार हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) चंद सवारों को लेकर उनके मुक़ाबले हुए, घमासान की लड़ाई हुई। मुसलमान रूमियों को दबाते हुए बराबर किले की तरफ चले गए और रूमियों के हमराह (साथ) किले के अंदर दाखिल हो गए। हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) हर एक लड़ाई में सबसे आगे हुआ करते थे। इस मौक़े पर भी वह सबसे आगे थे। रूमियों ने मुसलमानों को दरवाज़े में देखा तो सख्त घबराए और चारों तरफ से सिपाहियों के गिरोह के गिरोह दरवाज़े पर अपने हमराहियों की पुश्त (पीठ) पर आ गए और फिर किले का दरवाज़ा एक दम बंद कर दिया। इस अत्ना (दौरान) में हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) मुस्लिमा बिन मख्लद और अपने गुलाम दरदान के साथ किले के अंदर ही रह गए। रूमी उन्हें गिरफ्तार करके अपने आला अफ़सर के पास ले गए। रूमी अफ़सर ने इन क़ैदियों को मामूली सिपाही समझा। क्योंकि हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कोई जनरली (सेनापति वाली) वर्दी नहीं पहनी हुई थी बल्कि उनका लिबास बिल्कुल अपने हमराही और गुलाम जैसा सादा था। इसलिए रूमी अफ़सर ने बड़ी हक़ारत (नफ़रत) से उन्हें मुख़ातिब करके कहा: "तुम भूखे-नंगे और जाहिल अरबों ने इन मुल्कों में फ़ित्ना (उत्पात) बरपा कर रखा है।" हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने निहायत बेबाकाना (निडरता) तौर पर जवाब दिया: "हम फ़ित्ना फैलाने नहीं आए। बल्कि हम इन अक़्वाम (क़ौमों) को पस्ती से निकाल कर तरक़्क़ी व ख़ुशहाली के बाम (शिखर) पर पहुँचाने आए हैं। हम इस्लाम की बरकतें साथ लाए हैं जो हम हर एक क़ौम के सामने पेश करते हैं। अगर तुम इस लाज़वाल (कभी न खत्म होने वाली) दौलत से महरूम रहना चाहते हो तो हम तुम्हें अपनी हिफ़ाज़त में लेकर इस मुल्क को दारुल-अमान (शान्ति का घर) बना देंगे।" रूमी अफ़सर यह दिलेराना जवाब सुनकर अपने मातहतों (कर्मचारियों) को रूमी ज़बान में कहने लगा: "यह शख़्स अरबी लश्कर का सरदार मालूम होता है। बेहतर है कि हम इसे क़त्ल कर दें ताकि मुसलमानों पर हमारी दहशत बैठ जाए।" अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) का गुलाम दरदान रूमी ज़बान समझता था। उसने अपने आक़ा (मालिक) को ख़तरे में देखा तो हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) के मुँह पर ज़ोर से तमाचा मारा और कहा: "बेअदब गुस्ताख़! किसने तुम्हें इख़्तियार दिया है कि अहले-अरब की तरफ से ऐसे कलीमात (शब्द) दो अफ़सरों और हाकिमों के सामने कहो। चुप रहो, यह तुम्हारा काम नहीं।" हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) ख़ामोश हो गए और मुस्लिमा बिन मख्लद ने कहा: "बेशक हमें ऐसी कोई बात कहने का हक़ नहीं और अगर आप अपने चंद आला अफ़सर अहले-अरब के अफ़सरों के पास भेजें तो मुमकिन है कि वह सब मिलकर ऐसी शरायत (शर्तें) बाहम तय कर लें जिन पर हममें और आपमें सुल्ह (संधि) हो जाए क्योंकि हमें अच्छी तरह मालूम है कि अरब सरदार जंग की निस्बत सुल्ह को ज़्यादा पसंद करते हैं।" अब रूमी अफ़सर समझा कि हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) कोई बड़े आदमी नहीं, आम से सिपाही हैं वरना उन्हें तमाचा क्यों पड़ता। वह अहले-अरब की शिद्दत-ए-मुहासिरा (कड़ी घेराबंदी) से तंग आ चुका था। वह इस बात से बहुत खुश हुआ और कहा: "अच्छा हम तुम्हें छोड़ देते हैं, तुम जाकर अपने अफ़सरों से कहो कि वह सुल्ह करना चाहें तो हम बिल्कुल तैयार हैं।" मुस्लिमा बिन मख्लद ने रूमी अफ़सर का शुक्रिया अदा किया और रूमी सिपाही उन्हें किले के बाहर छोड़ आए। उधर इस्लामी लश्कर में हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) और मुस्लिमा की गिरफ़्तारी के बाइस (कारण) बड़ी परेशानी थी। मगर जूँही उन्होंने अपने सरदार को सही-सलामत आते देखा तो मारे ख़ुशी के 'अल्लाहु अकबर' के नारों से आसमान सर पर उठा लिया। रूमियों के कानों में यह ख़ुशी की आवाज़ पड़ी तो वह बहुत परेशान हुए। गुलाम ने आक़ा को जो तमाचा मारा था, उसकी हिकमत (बुद्धिमत्ता) अब उनकी समझ में आई। __________📝📝📝__________ किताब : हिकमत व नसीहत के हैरानकुन वाक़ियात। पृष्ठ संख्या: 83-84 लेखक : मोहम्मद इसहाक़ मुल्तानी। चयन : इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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