عربی اول

مشکوة العربیہ شرح مفتاح العربیہ جلد ١
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علم النحو مع ترکیب
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شرحِ مفید الطالبین
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آسان نحو جلد 1
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آسان نحو جلد 2
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کنز اللغات
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مفید الطالبین
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الدروس النحویہ
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القراءۃ الراشدۃ 1۔2
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नमाज़ की बरकत और इंसान की फ़ितरत

नमाज़ की बरकत और इंसान की फ़ितरत

आज फज्र के बाद मैं तिलावत (कुरान का पाठ) कर रहा था तो सूरह अल-मआरिज की एक आयत पर आकर रुक सा गया। बात इंसान की तख़्लीक़ (सृष्टि) के बारे में थी कि इंसान असल में पैदा कैसा हुआ है। आयत थी: "इन्नल इंसाने ख़ुलिक़ा हलूआ" (बेशक इंसान बहुत कम हौसला पैदा किया गया है) हक़ीक़त यह है कि इंसान में सब्र और बर्दाश्त की बहुत कमी रखी गई है। मैंने अंग्रेजी तर्जुमा (अनुवाद) देखा, तो "हलूआ" का मतलब 'ऐंग्विश' (Anguish) लिखा था। अब ऐंग्विश का मतलब उर्दू-हिंदी में समझें तो यही लगता है कि ऐसा इंसान जिसमें बेचैनी, तश्वीश (चिंता), या बेसब्री सी हो। बहरहाल, मैंने इसे "कम हिम्मत" पर ही इक्तिफ़ा (संतोष) कर लिया और इसे बेसब्री के मायनों में ले लिया। अगली आयत कुछ और भी मायने रखती थी: "इज़ा मस्सहुश-शर्रु ज़ज़ूआ" (जब उसे कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो बहुत घबरा जाता है) "ज़ज़ूआ" का लफ़्ज़ तो मुझे समझ आ गया, अंग्रेजी में अनुवाद भी करीब-करीब ही था—'इम्पेशेंट' (Impatient), मतलब बेचैन। यानी जब इंसान को कोई तकलीफ़ या दुःख पहुँचे तो वह चाहता है कि बस अब यह रफ़ा (दूर) हो जाए, बस किसी तरह ख़त्म हो जाए। "व इज़ा मस्सहुल-ख़ैरु मनूआ" (और जब उसके पास ख़ुशहाली आती है तो बहुत बखील बन जाता है) "मनूआ" यानी कंजूस। जब उसे कोई नेमत (वरदान) मिलती है, तो उसका दिल चाहता है कि बस वह नेमत उसी के पास रहे, किसी और को न मिले। जो रुला देने वाली आयत थी, वह बाद में आई: "इल्लल मुसल्लीन" (मगर नमाज़ पढ़ने वाले ऐसे नहीं हैं) यानी नमाज़ पढ़ने वाले लोगों के अलावा इंसान की हालत इसी तरह की है। इंसान की यह पैदाइशी हालत सिर्फ उसी सूरत में बदल सकती है, जब वह नमाज़ क़ायम कर लेता है। मुझे एक अजीब सी ख़ुशी महसूस हुई यह सोचकर। मैं पहली तीन आयतें पढ़कर हैरान हो रहा था कि अल्लाह तआला अपने ही बनाए इंसान की कमियाँ और ख़ामियाँ गिनवा रहा है, लेकिन जब "इल्लल मुसल्लीन" पढ़ा तो दिल मुतमइन (संतुष्ट) सा हो गया कि इन कमियों और ख़ामियों को पूरा करने का अल्लाह तआला ने रास्ता रखा हुआ है। अगर कोई नमाज़ पढ़ता है तो वह "हलूआ", "ज़ज़ूआ" और "मनूआ" की दिली और जज़्बाती (भावनात्मक) हालतों से निकल सकता है। और मैं सोचने लगा, यानी तसव्वुर (कल्पना) करने लगा, कि इंसान से तश्वीश (चिंता), बेचैनी और कंजूसी निकल जाए तो इंसान की कैसी हालत होती होगी। यानी नमाज़ ही की बरकत से इंसान के दिल से चिंता, बेचैनी और कंजूसी निकलती है, और उसकी परेशानी, घुटन और तंगदिली दूर हो जाती है। इंसान में कैसी वुक़अत (विशालता) और कैसी कुशादगी (उदारता) आ जाती है! इंसान की तबीयत कितनी हल्की-फुल्की हो जाती है, और उसके दिल पर बोझ डालने वाली चीजें किस तरह ग़ायब हो जाती हैं। बेशक नमाज़ एक अज़ीम (महान) नेमत है। अज़ क़लम (लेखक): अब्दुल ख़ालिक़ क़ासमी खुरेजी, दिल्ली। ___________📝📝____________ मनक़ूल (उद्धृत)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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